CGPSC में दो महीने से नेतृत्व का सूखा: संविधान में कार्यवाहक अध्यक्ष का प्रावधान, फिर भी सरकार क्यों है मौन? युवाओं के भविष्य और संवैधानिक संस्था की साख पर गंभीर सवाल
विशेष संवाददाता,
रायपुर |छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) में अध्यक्ष का पद पिछले दो महीनों से रिक्त है। आयोग की पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष रीता शांडिल्य 8 सितंबर 2026 को 62 वर्ष की आयु पूरी होने पर पद से मुक्त हुईं, लेकिन उनके स्थान पर अब तक न तो किसी स्थायी अध्यक्ष की नियुक्ति हुई है और न ही किसी मौजूदा सदस्य को कार्यवाहक अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है। प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक भर्ती संस्था का इस तरह नेतृत्वविहीन रहना अब महज प्रशासनिक देरी का विषय नहीं रह गया है। यह सरकार की जवाबदेही, संवैधानिक प्रावधानों के पालन और प्रदेश के हजारों युवाओं के भविष्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन चुका है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब भारतीय संविधान में अध्यक्ष का पद रिक्त होने की स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था का स्पष्ट प्रावधान मौजूद है, तो फिर लगभग दो महीने तक आयोग को इस तरह नेतृत्वविहीन क्यों रहने दिया गया?
संविधान में व्यवस्था, फिर सरकार की चुप्पी क्यों?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 315 के तहत प्रत्येक राज्य में लोक सेवा आयोग की स्थापना का प्रावधान है। वहीं अनुच्छेद 316(1) स्पष्ट करता है कि राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाएगी।
अनुच्छेद 316(2) के अनुसार आयोग के सदस्य और अध्यक्ष छह वर्ष की अवधि अथवा 62 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, पद पर रह सकते हैं।
लेकिन इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 316(1A) है। इसमें स्पष्ट व्यवस्था है कि यदि आयोग के अध्यक्ष का पद रिक्त हो जाए अथवा अध्यक्ष किसी कारणवश अपने दायित्वों का निर्वहन करने में असमर्थ हो, तो आयोग के अन्य सदस्यों में से किसी एक को राज्यपाल कार्यवाहक अध्यक्ष नियुक्त कर सकते हैं। यह व्यवस्था नए नियमित अध्यक्ष की नियुक्ति होने तक प्रभावी रहती है।
अर्थात संविधान ने अध्यक्ष पद रिक्त होने की स्थिति में आयोग का कामकाज संचालित करने का रास्ता पहले से उपलब्ध कराया है। इसके लिए किसी नए कानून, विधानसभा की मंजूरी अथवा संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता नहीं है।
ऐसे में सवाल उठता है कि राज्य सरकार ने राज्यपाल के समक्ष कार्यवाहक अध्यक्ष की नियुक्ति का प्रस्ताव क्यों नहीं रखा? क्या इस संबंध में कोई प्रस्ताव भेजा गया है? यदि नहीं, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
यहां यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि अनुच्छेद 316(1A) के तहत कार्यवाहक अध्यक्ष की नियुक्ति राज्यपाल का संवैधानिक अधिकार है। राज्य सरकार की भूमिका आवश्यक प्रशासनिक प्रक्रिया और सलाह उपलब्ध कराने की है।
नियुक्ति में देरी के पीछे क्या है असली वजह?
अध्यक्ष की नियुक्ति में हो रही देरी के पीछे सरकार की ओर से अब तक कोई विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। हालांकि राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं हैं।
पहला, बेदाग छवि और विश्वसनीयता की चुनौती: CGPSC पिछले वर्षों में भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और चयन संबंधी विवादों के कारण गंभीर सवालों के घेरे में रहा है। ऐसे में सरकार के सामने किसी ऐसे व्यक्ति को अध्यक्ष बनाने की चुनौती है जिसकी निष्पक्षता, प्रशासनिक क्षमता और सार्वजनिक छवि पर सवाल न उठें। आयोग की साख बहाल करना नई नियुक्ति के लिए सबसे बड़ी कसौटी होनी चाहिए।
दूसरा, संभावित नामों पर सहमति का अभाव: वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों, विशेषकर रेणु पिल्ले जैसे नामों को लेकर चर्चाएं होती रही हैं। लेकिन किसी नाम पर अंतिम निर्णय होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। केवल चर्चाओं के आधार पर किसी व्यक्ति की दावेदारी या नियुक्ति तय मानना उचित नहीं होगा।
तीसरा, राजनीतिक और प्रशासनिक प्राथमिकताओं का सवाल: कांग्रेस सहित विपक्षी दल सरकार पर निशाना साध रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार की प्रशासनिक निष्क्रियता का खामियाजा प्रदेश के युवाओं को भुगतना पड़ रहा है। हालांकि नियुक्ति में देरी के पीछे किसी राजनीतिक मंशा अथवा भर्ती रोकने की साजिश का अभी कोई प्रमाण सार्वजनिक नहीं है।
हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद सरकार की जवाबदेही और बढ़ी
मामला अब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है।
26 अक्टूबर 2026 को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक प्रकरण में CGPSC के अध्यक्ष अथवा कार्यवाहक अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए राज्य सरकार को आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया।
मामला आठ मनोरोग विशेषज्ञों के चयन से जुड़ा था। न्यायालय के समक्ष यह तथ्य आया कि आयोग ने 13 अक्टूबर को ही सामान्य प्रशासन विभाग को अध्यक्ष अथवा कार्यवाहक अध्यक्ष नियुक्त करने के लिए पत्र लिखा था, जबकि अध्यक्ष 8 सितंबर को ही पदमुक्त हो चुके थे।
न्यायालय ने राज्य सरकार से नियुक्ति की दिशा में कदम उठाने और संबंधित चयन प्रक्रिया शीघ्र पूरी कराने को कहा। मामले की अगली सुनवाई 26 नवंबर 2026 निर्धारित की गई।
इस न्यायिक हस्तक्षेप के बाद सरकार के सामने अब केवल प्रशासनिक सुविधा का नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्था के सुचारु संचालन का भी प्रश्न है।
भर्ती परीक्षाओं पर सीधा असर, युवाओं की बढ़ती परेशानी
अध्यक्ष पद रिक्त रहने का असर आयोग की भर्ती संबंधी गतिविधियों पर दिखाई देने लगा है।
1. राज्य सेवा परीक्षा-2025 के 608 अभ्यर्थियों के साक्षात्कार स्थगित
राज्य सेवा परीक्षा-2025 के तहत 265 पदों के लिए मुख्य परीक्षा के बाद 608 अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए चयनित किया गया था। इनके दस्तावेज सत्यापन और साक्षात्कार की प्रक्रिया सितंबर में प्रस्तावित थी, लेकिन आयोग ने इसे स्थगित कर दिया। हजारों परिवारों की उम्मीदें इन चयनित अभ्यर्थियों के परिणाम से जुड़ी हैं।
2. पुलिस विभाग के 297 पदों की भर्ती प्रभावित
उप निरीक्षक, सूबेदार और प्लाटून कमांडर के 297 पदों के लिए प्रस्तावित भर्ती परीक्षा भी स्थगित की जा चुकी है। इसी तरह लोक निर्माण विभाग के 40 पदों की भर्ती प्रक्रिया को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है।
3. राज्य सेवा परीक्षा-2026 के विज्ञापन पर संशय
26 नवंबर को संविधान दिवस के अवसर पर राज्य सेवा परीक्षा का विज्ञापन जारी होने की परंपरा रही है। ऐसे में आगामी विज्ञापन को लेकर अभ्यर्थियों में चिंता बढ़ रही है। यदि समय रहते आयोग में नेतृत्व की व्यवस्था नहीं होती है, तो परीक्षा कैलेंडर प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
4. विभागीय पदोन्नति की प्रक्रिया भी प्रभावित
छत्तीसगढ़ प्रदेश राजपत्रित अधिकारी संघ ने मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को पत्र लिखकर आयोग में अध्यक्ष की नियुक्ति की मांग की है। संघ के अनुसार, प्रदेश के 54 विभागों में अधिकारियों की विभागीय पदोन्नति से संबंधित प्रक्रियाएं प्रभावित हो रही हैं। इससे स्पष्ट है कि आयोग के नेतृत्व का प्रश्न केवल प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित नहीं है।
क्या अध्यक्ष के बिना आयोग का काम पूरी तरह बंद हो जाता है?
यहां एक संवैधानिक और प्रशासनिक अंतर समझना जरूरी है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 320 में लोक सेवा आयोग के कार्यों का उल्लेख है। इनमें भर्ती परीक्षाओं का आयोजन, नियुक्तियों के लिए चयन, साक्षात्कार तथा पदोन्नति और अनुशासनात्मक मामलों में परामर्श जैसी जिम्मेदारियां शामिल हैं।
आयोग एक सामूहिक संवैधानिक संस्था है। अध्यक्ष के पद रिक्त होने मात्र से आयोग के सभी सदस्यों की शक्तियां समाप्त नहीं हो जातीं और न ही प्रत्येक प्रशासनिक या तकनीकी कार्य स्वतः अवैध हो जाता है। लेकिन अध्यक्ष के अभाव में जिन निर्णयों और प्रक्रियाओं के लिए अध्यक्षीय नेतृत्व आवश्यक है, वे प्रभावित हो सकते हैं।
इसीलिए संविधान के अनुच्छेद 316(1A) में कार्यवाहक अध्यक्ष की व्यवस्था की गई है। इस प्रावधान की मौजूदगी में लंबे समय तक वैकल्पिक नेतृत्व नियुक्त न होना सरकार से जवाब मांगने का पर्याप्त आधार है।
अब सरकार को इन सवालों का जवाब देना चाहिए
1. 8 सितंबर 2026 को अध्यक्ष का पद रिक्त होने के बाद कार्यवाहक अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए तत्काल पहल क्यों नहीं की गई?
2. क्या सामान्य प्रशासन विभाग ने राज्यपाल को अनुच्छेद 316(1A) के तहत नियुक्ति का प्रस्ताव भेजा है?
3. यदि प्रस्ताव नहीं भेजा गया, तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी कौन हैं?
4. क्या सरकार ने स्थायी अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए कोई चयन प्रक्रिया अथवा प्रशासनिक विचार-विमर्श शुरू किया है?
5. राज्य सेवा परीक्षा-2025 के 608 अभ्यर्थियों के साक्षात्कार की नई तारीख कब घोषित होगी?
6. 26 नवंबर को प्रस्तावित राज्य सेवा परीक्षा-2026 के विज्ञापन को लेकर सरकार और आयोग की क्या तैयारी है?
7. विभागीय पदोन्नति से जुड़े मामलों में उत्पन्न गतिरोध दूर करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
युवाओं के भविष्य से बड़ा कोई प्रशासनिक बहाना नहीं
लोक सेवा आयोग किसी सरकार का विभागीय कार्यालय मात्र नहीं है। यह संविधान से स्थापित एक स्वतंत्र और महत्वपूर्ण संस्था है, जिसके माध्यम से राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए योग्य और प्रतिभाशाली युवाओं का चयन किया जाता है।
CGPSC की विश्वसनीयता पहले ही भर्ती विवादों के कारण चुनौती का सामना कर चुकी है। ऐसे समय में आयोग को नेतृत्वविहीन छोड़ना उसकी संस्थागत साख को और कमजोर कर सकता है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है। पहली, आयोग की निष्पक्षता और विश्वसनीयता बहाल करने के लिए योग्य, ईमानदार और सक्षम व्यक्ति को स्थायी अध्यक्ष नियुक्त करना। दूसरी, तब तक संविधान के अनुच्छेद 316(1A) के अनुरूप कार्यवाहक अध्यक्ष की व्यवस्था सुनिश्चित करना।
सरकार को यह समझना होगा कि अध्यक्ष की नियुक्ति किसी राजनीतिक पद पर नियुक्ति भर नहीं है। यह उन हजारों युवाओं के भविष्य से जुड़ा दायित्व है, जो वर्षों की मेहनत, आर्थिक संसाधन और जीवन का महत्वपूर्ण समय देकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं।
संविधान ने रास्ता दिया है, आयोग ने आवश्यकता जताई है और उच्च न्यायालय भी सरकार को कदम उठाने का निर्देश दे चुका है। अब सवाल यह नहीं कि अध्यक्ष की नियुक्ति कब सुविधाजनक होगी, बल्कि यह है कि संवैधानिक संस्था को दो महीने तक नेतृत्वविहीन रखने की जवाबदेही कौन लेगा?
प्रदेश के युवाओं को आश्वासन नहीं, स्पष्ट समयसीमा और परिणाम चाहिए।



Beauro Cheif



