कामधेनु की भर्ती पर कुलाधिपति की रोक से मचा हड़कंप, अब दूसरे विश्वविद्यालयों की भर्तियों पर भी उठे सवाल
जगदलपुर में बाहरी अभ्यर्थियों और मेरिट को लेकर आरोप, रविवि में स्थानीय उम्मीदवारों की उपेक्षा की शिकायत; अब राजभवन के रुख पर नजर
रायपुर/दुर्ग। दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय में भर्ती प्रक्रिया को लेकर लगातार सामने आ रही गंभीर शिकायतों के बाद कुलाधिपति स्तर से तत्काल संज्ञान लेकर भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगाए जाने से प्रदेश की विश्वविद्यालयीन भर्ती व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। विश्वविद्यालय कार्य परिषद के सात सदस्यों ने भी भर्ती में रोस्टर, आरक्षण, बैकलॉग पदों, स्वीकृत सेटअप से अधिक पदों पर विज्ञापन तथा कार्य परिषद की स्वीकृति जैसे मुद्दे उठाते हुए भर्ती तत्काल स्थगित कर स्वतंत्र एवं उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
खास बात यह है कि 2 अक्टूबर से प्रस्तावित साक्षात्कार की तैयारियों के बीच भर्ती पर रोक का फैसला सामने आया। ऐसे में अब कामधेनु विश्वविद्यालय की कार्रवाई ने उन विश्वविद्यालयों की ओर भी ध्यान खींच दिया है, जहां भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर पहले से शिकायतें और विवाद मौजूद हैं।
जगदलपुर में फिर गरमाया भर्ती विवाद
शहीद महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय, जगदलपुर में शिक्षकीय भर्ती को लेकर पहले भी गंभीर आरोप सामने आ चुके हैं। जुलाई-अगस्त 2026 में भाजपा से जुड़े पूर्व विधायक संतोष बाफना सहित कांग्रेस नेताओं ने कुलपति मनोज श्रीवास्तव की कार्यप्रणाली और भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठाए। आरोपों में बाहरी राज्यों के अभ्यर्थियों को कथित प्राथमिकता और आर्थिक लेन-देन तक के दावे किए गए हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, जबकि विश्वविद्यालय प्रशासन पूर्व में भर्ती प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप होने की बात कह चुका है।
इससे पहले भी विश्वविद्यालय की भर्ती को लेकर मेरिट की अनदेखी, चयन परिणामों की पारदर्शिता और चयन प्रक्रिया से जुड़े सवाल उठ चुके हैं।
यानी सवाल केवल यह नहीं है कि भर्ती नियमों के अनुसार हो रही है या नहीं, बल्कि यह भी है कि नियमों के दायरे में होने वाली चयन प्रक्रिया में मेरिट, पारदर्शिता और सभी पात्र अभ्यर्थियों के साथ समान अवसर सुनिश्चित हो रहा है या नहीं।
रविवि में 60 पदों की भर्ती पर भी सवाल
पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर में भी 60 शैक्षणिक पदों की भर्ती को लेकर शिकायतें सामने आई हैं। शिकायतकर्ताओं की ओर से स्थानीय योग्य उम्मीदवारों की उपेक्षा और बाहरी अभ्यर्थियों को अवसर दिए जाने के आरोप लगाए गए हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से भर्ती प्रक्रिया में UGC नियमों के पालन की बात कही गई है।
लेकिन विवाद का मूल प्रश्न केवल UGC नियमों के पालन का नहीं, बल्कि चयन के परिणाम और उसकी पारदर्शिता का बताया जा रहा है। शिकायतकर्ता यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुरूप हैं, तो चयनित अभ्यर्थियों की योग्यता, मेरिट और चयन के आधार को लेकर उठ रहे सवालों का सार्वजनिक रूप से समाधान कैसे होगा।
अब बड़ा सवाल—क्या राजभवन की नजर प्रदेश की अन्य भर्तियों पर भी पड़ेगी?
कामधेनु विश्वविद्यालय में शिकायतों के बाद तत्काल हस्तक्षेप और भर्ती पर रोक ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या अब प्रदेश के अन्य विश्वविद्यालयों की विवादित या शिकायतग्रस्त भर्ती प्रक्रियाओं की भी इसी तरह समीक्षा होगी?
विशेषकर उन विश्वविद्यालयों में, जहां पहले से मेरिट, रोस्टर, स्थानीय अभ्यर्थियों की स्थिति, चयन समिति की पारदर्शिता अथवा बाहरी अभ्यर्थियों के चयन को लेकर शिकायतें मौजूद हैं।
कामधेनु का मामला अब केवल एक विश्वविद्यालय की भर्ती तक सीमित नहीं दिख रहा। यह प्रदेश की विश्वविद्यालयीन भर्ती व्यवस्था में नियमों के पालन के साथ-साथ चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी बहस का कारण बन गया है।
अब निगाह इस बात पर है कि कुलाधिपति स्तर से कामधेनु में हुई कार्रवाई क्या केवल एक मामले तक सीमित रहती है, या शिकायतों से घिरे अन्य विश्वविद्यालय भी राजभवन की जांच-पड़ताल के दायरे में आते हैं।



Beauro Cheif



