कुलसचिव हटे तो गरमाया विवाद, कुलपति-कुलसचिव टकराव भी बना चर्चा का केंद्र

फरवरी में हाईकोर्ट दे चुका है फैसला—विश्वविद्यालय सेवा के कुलसचिव को विवि से बाहर भेजने के प्रावधान पर उठ चुके हैं सवाल

कुलसचिव हटे तो गरमाया विवाद, कुलपति-कुलसचिव टकराव भी बना चर्चा का केंद्र

दुर्ग/रायपुर, 29 सितंबर। हेमचंद यादव विश्वविद्यालय दुर्ग के नियमित कुलसचिव भूपेन्द्र कुलदीप को विश्वविद्यालय से हटाकर उच्च शिक्षा संचालनालय, इंद्रावती भवन नवा रायपुर में पदस्थ किए जाने के राज्य शासन के आदेश ने विश्वविद्यालय की प्रशासनिक राजनीति को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। कुलदीप के स्थान पर शासकीय वी.वाई.टी. महाविद्यालय दुर्ग के इतिहास विषय के प्राध्यापक डॉ. अनिल कुमार पांडेय को प्रभारी कुलसचिव बनाया गया है।

इस फेरबदल के बीच विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. संजय तिवारी और कुलसचिव भूपेन्द्र कुलदीप के बीच लंबे समय से चले आ रहे कथित विवाद को भी इस घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है। विश्वविद्यालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार दोनों के बीच समय के साथ मतभेद गहराते गए थे और कुलपति की कार्यप्रणाली एवं व्यवहार को लेकर भी विभिन्न स्तरों पर शिकायतें सामने आई थीं।

कुलपति के खिलाफ शिकायतों की जांच के लिए बनी थी उच्चस्तरीय कमेटी

सूत्रों के अनुसार स्थानीय जनप्रतिनिधियों की ओर से कुलपति की कार्यप्रणाली को लेकर कुलाधिपति एवं राज्य शासन के समक्ष शिकायतें की गई थीं। इसके बाद शिकायतों की जांच के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित की गई। बताया जा रहा है कि समिति अपनी रिपोर्ट तैयार कर चुकी है और रिपोर्ट कुलाधिपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाना है।

हालांकि, जांच रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं होने के कारण उसमें दर्ज निष्कर्षों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है। सूत्रों का दावा है कि जांच के दौरान कुछ शिकायतों से संबंधित दस्तावेजी सामग्री समिति के समक्ष सामने आई है। इस दावे की आधिकारिक पुष्टि अभी शासन या राजभवन की ओर से नहीं हुई है।

कुलसचिव को हटाने को लेकर भी बढ़ा था टकराव

विश्वविद्यालय से जुड़े सूत्रों का कहना है कि कुलपति और कुलसचिव के बीच विवाद के दौरान कुलसचिव को विश्वविद्यालय से हटाए जाने की चर्चा लंबे समय से चल रही थी। सूत्रों का दावा है कि कुलपति डॉ तिवारी कुलसचिव की कार्यप्रणाली से व्यक्तिगत तौर पर असंतुष्ट थे और उन्हें विश्वविद्यालय से बाहर भेजे जाने की कोशिशें चल रही थीं।

ऐसे में 29 सितंबर को जारी हुआ यह आदेश विश्वविद्यालय के भीतर चल रहे सत्ता-संतुलन के विवाद से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि कुलपति डॉ. संजय तिवारी की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, इसलिए उनके कथित उद्देश्य या भूमिका पर अंतिम निष्कर्ष निकालना फिलहाल उचित नहीं होगा।

कुलपति पर भी कार्रवाई की अटकलें

इधर, सूत्र यह भी बता रहे हैं कि कुलपति के विरुद्ध प्राप्त शिकायतों और जांच प्रक्रिया के बाद आगे कोई बड़ी कार्रवाई हो सकती है। हालांकि शासन या राजभवन की ओर से ऐसी किसी प्रस्तावित कार्रवाई की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

विश्वविद्यालय से जुड़े एक अन्य सूत्र के अनुसार, जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद कुछ संगठनों एवं उनसे जुड़े लोगों ने संभावित कार्रवाई के मामले में हस्तक्षेप से दूरी बना ली है। इस दावे की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

हाईकोर्ट के पुराने फैसले से भी जुड़ा है मामला

कुलदीप की नई पदस्थापना को लेकर कानूनी सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि 9 फरवरी 2026 को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बिनोद कुमार एक्का मामले में विश्वविद्यालय के नियमित कुलसचिव को उच्च शिक्षा आयुक्त के कार्यालय में भेजे जाने के आदेश को निरस्त किया था। अदालत ने छत्तीसगढ़ विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 की धारा 15-C और State University Service Rules, 1983 के Rule 22 की व्याख्या करते हुए कहा था कि संबंधित सेवा नियमों में कुलसचिव को एक विश्वविद्यालय से दूसरे विश्वविद्यालय में स्थानांतरित करने की व्यवस्था है, लेकिन विश्वविद्यालय से बाहर किसी अन्य स्थापना में भेजने का प्रावधान नहीं दिखता।

29 सितंबर के नए आदेश में भी भूपेन्द्र कुलदीप को किसी दूसरे विश्वविद्यालय में नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा संचालनालय, इंद्रावती भवन, नवा रायपुर में पदस्थ किया गया है। ऐसे में फरवरी के हाईकोर्ट फैसले के संदर्भ में इस नई पदस्थापना की वैधानिकता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

हालांकि, नए आदेश में इसे “नई पदस्थापना” कहा गया है और आदेश में इस पदस्थापना के लिए किसी विशिष्ट वैधानिक धारा का उल्लेख नहीं किया गया है। इसलिए इसकी अंतिम कानूनी स्थिति संबंधित सेवा अभिलेखों और शासन द्वारा लिए गए आधार की जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।

सेवा समाप्त नहीं, बदली गई पदस्थापना

आदेश का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि भूपेन्द्र कुलदीप को सेवा से बर्खास्त या विश्वविद्यालय सेवा से निष्कासित नहीं किया गया है। उन्हें कुलसचिव, हेमचंद यादव विश्वविद्यालय की वर्तमान पदस्थापना से हटाकर उच्च शिक्षा संचालनालय में नई पदस्थापना दी गई है।

अब इस पूरे घटनाक्रम में दो सवाल सबसे महत्वपूर्ण हैं—क्या नियमित कुलसचिव को विश्वविद्यालय से बाहर संचालनालय में भेजने के लिए शासन के पास कोई अलग वैधानिक आधार है? और दूसरा, कुलपति के विरुद्ध चल रही शिकायतों की जांच का अंतिम परिणाम क्या होगा?

इन दोनों सवालों के जवाब आने वाले दिनों में हेमचंद यादव विश्वविद्यालय के प्रशासनिक घटनाक्रम की अगली दिशा तय कर सकते हैं।