उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में छात्रा ने प्रोफेसर पर लगाए गंभीर आरोप..
यौन उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना और पद के दुरुपयोग की शिकायत; महिला आयोग सहित कई संस्थाओं तक पहुंचा मामला
नैनीताल। उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में एक छात्रा द्वारा पत्रकारिता विभाग के प्रोफेसर राकेश चंद्र रयाल के विरुद्ध गंभीर आरोप लगाते हुए विस्तृत शिकायत दर्ज कराए जाने से विश्वविद्यालय जगत में हलचल मच गई है। छात्रा ने आरोप लगाया है कि प्रोफेसर ने अपने पद और प्रभाव का दुरुपयोग करते हुए उसके साथ मानसिक प्रताड़ना, अनुचित व्यवहार तथा उत्पीड़न किया। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि प्रोफेसर द्वारा छात्रा पर यौन संबंध बनाने के लिए दबाव डाला गया तथा उसकी असहमति के बावजूद लगातार संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया गया।
मामले की शिकायत विश्वविद्यालय प्रशासन, कुलपति, आंतरिक शिकायत समिति, राज्य महिला आयोग तथा अन्य संबंधित अधिकारियों को भेजी गई है। शिकायत सामने आने के बाद विश्वविद्यालय परिसर और उच्च शिक्षा जगत में इस मामले को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।
शिकायत में क्या लगाए गए हैं आरोप:
छात्रा ने अपने शिकायत पत्र में कहा है कि वह विश्वविद्यालय की नियमित छात्रा है और अध्ययन के दौरान उसे कई बार ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा जिससे वह स्वयं को असुरक्षित और मानसिक रूप से प्रताड़ित महसूस करने लगी। शिकायत के अनुसार संबंधित प्रोफेसर ने अपने अधिकार और पद की स्थिति का उपयोग करते हुए छात्रा पर व्यक्तिगत स्तर पर दबाव बनाने का प्रयास किया।
छात्रा का आरोप है कि उसे बार-बार ऐसे संकेत और प्रस्ताव दिए गए जो एक शिक्षक और छात्रा के बीच मर्यादित एवं पेशेवर संबंधों की सीमा से बाहर थे। शिकायत में कहा गया है कि इन परिस्थितियों ने उसके आत्मसम्मान, गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाला।
लंबे समय तक चुप रहने का दावा:
शिकायतकर्ता ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि उसने लंबे समय तक परिस्थितियों को नजरअंदाज करने और सामान्य बनाए रखने का प्रयास किया। उसका कहना है कि वह किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहती थी और अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना चाहती थी। लेकिन कथित घटनाओं की पुनरावृत्ति और लगातार बढ़ते दबाव के कारण वह अंततः औपचारिक शिकायत दर्ज कराने के लिए विवश हुई।
छात्रा ने कहा है कि कई अवसरों पर उसने स्वयं को ऐसी स्थिति में पाया जहां उसे मानसिक तनाव, भय और असहजता का सामना करना पड़ा। उसके अनुसार यह स्थिति धीरे-धीरे इतनी गंभीर हो गई कि उसे अपने शैक्षणिक भविष्य को लेकर भी चिंता होने लगी।
शैक्षणिक भविष्य प्रभावित होने का भय:
शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि छात्रा को इस बात की आशंका थी कि यदि उसने विरोध किया या शिकायत दर्ज कराई तो उसके शैक्षणिक हित प्रभावित हो सकते हैं। छात्रा का दावा है कि उसे ऐसा वातावरण महसूस कराया गया जिससे वह स्वयं को दबाव में महसूस करने लगी।
उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षक और छात्र के बीच शक्ति संतुलन की असमानता को देखते हुए इस प्रकार के आरोपों को गंभीर माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी परिस्थितियों में छात्र-छात्राएं अक्सर शिकायत दर्ज कराने से हिचकते हैं क्योंकि उन्हें अपने शैक्षणिक मूल्यांकन और भविष्य पर प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है।
निष्पक्ष जांच की मांग:
छात्रा ने विश्वविद्यालय प्रशासन से मामले की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराने की मांग की है। शिकायत में कहा गया है कि जांच पूरी होने तक संबंधित प्रोफेसर को ऐसे किसी भी प्रशासनिक या शैक्षणिक दायित्व से दूर रखा जाए जिससे जांच प्रक्रिया प्रभावित हो सकती हो।
उसने यह भी अनुरोध किया है कि जांच के दौरान शिकायतकर्ता और संभावित गवाहों की गोपनीयता तथा सुरक्षा सुनिश्चित की जाए ताकि कोई भी व्यक्ति दबाव, भय या प्रतिशोध की आशंका के बिना अपना पक्ष रख सके।
सुरक्षा को लेकर भी जताई चिंता:
शिकायत पत्र में छात्रा ने अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा को लेकर भी चिंता व्यक्त की है। उसने कहा है कि मामला सार्वजनिक होने के बाद उसे सामाजिक, मानसिक अथवा संस्थागत दबाव का सामना करना पड़ सकता है। इस कारण उसने विश्वविद्यालय प्रशासन और संबंधित संस्थाओं से सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है।
महिला आयोग तक पहुंचा मामला:
मामले की गंभीरता को देखते हुए शिकायत राज्य महिला आयोग तक भी पहुंचाई गई है। महिला अधिकारों से जुड़े संगठनों का मानना है कि ऐसे मामलों में त्वरित और निष्पक्ष जांच न केवल शिकायतकर्ता को न्याय दिलाने के लिए आवश्यक है, बल्कि संस्थानों में सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करने के लिए भी महत्वपूर्ण है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन, आंतरिक शिकायत समिति और अन्य संबंधित संस्थाएं इस मामले पर किस प्रकार की कार्रवाई करती हैं तथा जांच की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और प्रभावी रहती है।
अभी तक नहीं आया आधिकारिक पक्ष:
समाचार लिखे जाने तक प्रोफेसर राकेश चंद्र रयाल की ओर से आरोपों पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं हो सकी थी। वहीं विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी मामले पर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है।
पत्रकारिता के सिद्धांतों और प्राकृतिक न्याय के आधार पर आरोपित पक्ष का मत प्राप्त होना भी आवश्यक माना जाता है। इसलिए मामले के संबंध में प्रोफेसर अथवा विश्वविद्यालय प्रशासन का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।
उच्च शिक्षा संस्थानों की जवाबदेही पर उठे सवाल:
यह मामला एक बार फिर उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्राओं की सुरक्षा, यौन उत्पीड़न निरोधक तंत्र, आंतरिक शिकायत समितियों की प्रभावशीलता तथा संस्थागत जवाबदेही को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है। उत्तराखंड के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में समय-समय पर छात्राओं एवं महिला कर्मचारियों द्वारा उत्पीड़न संबंधी शिकायतें सामने आती रही हैं, जिससे यह विषय लगातार चिंता का कारण बना हुआ है।
यदि जांच में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला केवल एक व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उच्च शिक्षा संस्थानों में सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर व्यापक बहस को जन्म दे सकता है। फिलहाल पूरे मामले की सत्यता जांच रिपोर्ट और सक्षम संस्थाओं की कार्रवाई के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।



Beauro Cheif



