डामर-टाइल्स की किल्लत ने रोकी रफ्तार: क्या ठेकेदारों को घाटे में काम करने पर मजबूर कर रही सरकार?
रायपुर। छत्तीसगढ़ में सरकारी निर्माण कार्य अब गंभीर संकट में हैं। ईरान युद्ध के बाद निर्माण सामग्री की कीमतों में आई बेतहाशा बढ़ोतरी ने सिस्टम की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। सवाल उठ रहा है—जब बाजार दरें आसमान छू रही हैं, तो क्या सरकार ठेकेदारों से पुराने रेट पर काम कराने की जिद पर अड़ी है?
प्रदेशभर में सड़कों, भवनों और पुलों के निर्माण कार्य ठप होने की कगार पर हैं। सबसे बड़ा झटका डामर और टाइल्स की किल्लत ने दिया है। ठेकेदारों का साफ कहना है कि “या तो रेट बढ़ाओ, या काम रुक जाएगा।”
50 हजार से 84 हजार: डामर के दाम ने तोड़ा संतुलन
डामर, जो सड़कों की रीढ़ है, उसकी कीमत अचानक 50 हजार रुपए प्रति टन से बढ़कर 84 हजार रुपए प्रति टन पहुंच गई है। इसके बावजूद टेंडर पुराने रेट पर ही लागू हैं। ऐसे में ठेकेदारों के सामने सीधा सवाल है—काम करें या घाटा उठाएं?
गैस संकट से टाइल्स उद्योग ठप, सरकारी भवनों पर असर
सिर्फ सड़क ही नहीं, सरकारी भवन निर्माण भी प्रभावित है। गैस की कमी से टाइल्स उत्पादन घट गया है, जिससे सप्लाई चेन टूट चुकी है। नतीजा—काम अधूरा और लागत लगातार बढ़ती जा रही है।
20-25% महंगी सामग्री, फिर भी पुराने रेट—किसका फायदा?
स्टील, सीमेंट, गिट्टी, एल्यूमिनियम—हर सामग्री महंगी
लागत में 20 से 25% तक उछाल
लेकिन भुगतान पुराने टेंडर रेट पर
ऐसे में ठेकेदारों का आरोप है कि सरकार जमीनी हकीकत से आंखें मूंदे बैठी है, जबकि नुकसान पूरी तरह ठेकेदारों को झेलना पड़ रहा है।
10 अप्रैल को बड़ा फैसला: काम बंद करने की चेतावनी
छत्तीसगढ़ कांट्रेक्टर्स एसोसिएशन ने 10 अप्रैल को कोर कमेटी की बैठक बुलाई है। सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक में प्रदेशभर में निर्माण कार्य बंद करने जैसा बड़ा फैसला लिया जा सकता है।
एसोसिएशन के अध्यक्ष बीरेश शुक्ला का कहना है कि:
“डामर तक का स्टॉक नहीं मिल रहा, ऐसे में काम कैसे होगा? सरकार को तुरंत रेट रिवीजन करना होगा।”
करोड़ों के प्रोजेक्ट अधर में, जनता पर पड़ेगा सीधा असर
सड़कें अधूरी
ओवरब्रिज- अंडरब्रिज लटके
सरकारी भवनों का काम धीमा
अगर यही हाल रहा, तो इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा—खराब सड़कें, अधूरे प्रोजेक्ट और बढ़ती लागत का बोझ।
सीधा सवाल: जिम्मेदार कौन?
जब बाजार में कीमतें बढ़ रही थीं, तब क्या सरकार ने समय रहते समीक्षा नहीं की?
क्या ठेकेदारों को घाटे में काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है?
और सबसे बड़ा सवाल—अगर काम रुक गया, तो जवाबदेही किसकी होगी?



Beauro Cheif



