पीड़ित शिक्षिका को प्रताड़ित करने के लिए पॉश एक्ट के दुरुपयोग का आरोप उत्तराखंड के केंद्रीय विश्वविद्यालय का मामला..
श्रीनगर (उत्तराखंड)। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय (केंद्रीय विश्वविद्यालय) में पॉश अधिनियम के कथित दुरुपयोग का एक अनोखा और गंभीर मामला सामने आया है। विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार केंद्र में कार्यरत असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. हर्षवर्धिनी शर्मा ने अपने ही विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अमिता के खिलाफ पॉश एक्ट के तहत शिकायत दर्ज कराई है। आरोप है कि डॉ. अमिता पहले से ही विभाग के तत्कालीन निदेशक (विभागाध्यक्ष) द्वारा लंबे समय से प्रताड़ना का सामना कर रही थीं। इस पूरे प्रकरण में डॉ. हर्षवर्धिनी शर्मा और उनके पति डॉ. साकेत भारद्वाज की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। साथ ही विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका भी संदेह के घेरे में बताई जा रही है, क्योंकि आरोपी विभागाध्यक्ष पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार पत्रकारिता एवं जनसंचार केंद्र के पूर्व निदेशक डॉ. सुधांशु जायसवाल पर आरोप है कि वे लंबे समय से विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अमिता को मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे थे। डॉ. अमिता ने कई बार उनके व्यवहार पर आपत्ति दर्ज कराई, लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। आरोप है कि डॉ. जायसवाल द्वारा उनका पीछा करना, अभद्र व्यवहार करना, मानसिक दबाव बनाना और विभागीय कार्यों में असहयोग करना जैसी घटनाएं लगातार होती रहीं।
कुलपति- प्रो.श्री प्रकाश सिंह
इससे परेशान होकर डॉ. अमिता ने 24 दिसंबर 2024 को लिखित आपत्ति दर्ज कराई थी। इसके बावजूद कथित तौर पर निदेशक के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया। यहां तक कि कुलपति द्वारा अवकाश स्वीकृत होने के बावजूद डॉ. जायसवाल ने डॉ. अमिता के वेतन पत्रक में उन्हें बिना सूचना अनुपस्थित दर्शाते हुए वेतन में कटौती भी कर दी।
डॉ. अमिता ने 7 अप्रैल 2025 को इसकी पहली शिकायत तत्कालीन प्रभारी कुलपति प्रो. एम.एम.एस. रौथान से की। कार्रवाई नहीं होने पर 25 अप्रैल को स्मरण पत्र भेजा गया और 30 अप्रैल को आंतरिक शिकायत समिति (ICC) को ईमेल के माध्यम से पूरी स्थिति से अवगत कराया गया। इसके बाद 26 मई को उन्हें आईसीसी में सुनवाई के लिए बुलाया गया, लेकिन बताया जाता है कि समिति के पास मूल शिकायत की जानकारी ही नहीं थी। आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने शिकायत अग्रेषित नहीं की और आईसीसी ने भी मामले को गंभीरता से नहीं लिया।
करीब छह महीने बीत जाने के बावजूद इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जबकि तब तक विश्वविद्यालय में नए कुलपति Shriprakash Singh ने पदभार ग्रहण कर लिया था। आरोप है कि मामला उनके संज्ञान में आने के बावजूद वे इससे अनभिज्ञता जताते रहे। अंततः मामला National Commission for Women और National Human Rights Commission of India तक पहुंचा, जहां से कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए, लेकिन अब तक पॉश अधिनियम के तहत कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
इसी दौरान विभाग में कार्यरत कैमरापर्सन अरुणा रौथान के साथ कथित तौर पर डॉ. हर्षवर्धिनी शर्मा द्वारा बदसलूकी की गई। आरोप है कि उन्हें बचाने के दौरान डॉ. सुधांशु जायसवाल ने अरुणा रौथान को धक्का दिया और अभद्र भाषा का प्रयोग किया। बताया जा रहा है कि इन घटनाओं का मुख्य उद्देश्य डॉ. अमिता पर दबाव बनाना था ताकि वे नौकरी से इस्तीफा दे दें।
बाद में मामला बढ़ता देख डॉ. हर्षवर्धिनी शर्मा और उनके पति डॉ. साकेत भारद्वाज की ओर से अरुणा रौथान से माफी भी मांगी गई। आरोप यह भी है कि डॉ. सुधांशु जायसवाल पर पहले भी छात्राओं और महिला कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार के आरोप लग चुके हैं, लेकिन हर बार विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा उनका बचाव किया गया।
आंतरिक शिकायत समिति ने भी यह माना कि डॉ. जायसवाल का व्यवहार महिलाओं के प्रति उचित नहीं है और विभाग का वातावरण शैक्षणिक व प्रशासनिक दृष्टि से स्वस्थ नहीं है। इसके बावजूद अब तक उन्हें न तो निलंबित किया गया और न ही कोई कड़ी कार्रवाई की गई। उन्हें निदेशक पद से हटाया जरूर गया, लेकिन बताया जा रहा है कि उनका कार्यकाल पहले ही पूरा हो चुका था।
मामले में नया मोड़ 19 दिसंबर 2025 को आया, जब आईसीसी की चेयरपर्सन प्रो. मोनिका गुप्ता ने डॉ. अमिता को ईमेल के माध्यम से नोटिस भेजा। इसमें बताया गया कि डॉ. हर्षवर्धिनी शर्मा ने कुलपति को शिकायत की है कि डॉ. अमिता ने उनके मेडिकल कंडीशन और प्रेग्नेंसी के बारे में विद्यार्थियों के बीच चर्चा की और यह कहा कि वे गर्भावस्था का बहाना बनाकर ड्यूटी से बचना चाहती हैं।
डॉ. अमिता ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया है। जानकारी के अनुसार डॉ. हर्षवर्धिनी शर्मा ने स्वयं ही अपनी सोनोग्राफी रिपोर्ट संलग्न कर अधिकारियों को ईमेल के माध्यम से बताया था कि वे दो माह की गर्भवती हैं और परीक्षा ड्यूटी नहीं कर सकतीं। नियमों के अनुसार ऐसे मामलों में मेडिकल अवकाश लेने का प्रावधान होता है।
शिक्षा जगत में चर्चा है कि इस शिकायत में कहीं भी यौन उत्पीड़न (सेक्सुअल हरासमेंट) का तत्व नहीं है, फिर भी इसे पॉश अधिनियम के तहत आईसीसी को भेजा गया। इसे लेकर कई शिक्षाविद और सामाजिक संगठनों ने आपत्ति जताई है और इसे पॉश अधिनियम के दुरुपयोग का मामला बताया है।
इस पूरे प्रकरण को लेकर शिकायत University Grants Commission, महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग और स्थानीय थाने में भी की गई है। बताया जा रहा है कि उत्तराखंड के अन्य शैक्षणिक संस्थानों में भी पॉश अधिनियम के उल्लंघन के मामले सामने आ रहे हैं।
शिक्षा जगत में यह भी चर्चा है कि ऐसे मामलों में समय पर कड़ी कार्रवाई नहीं होने से आरोपियों के हौसले बढ़ रहे हैं। अब सामाजिक संगठनों और शिक्षाविदों द्वारा इस मामले को लेकर बड़े आंदोलन की तैयारी की जा रही है। लगातार बैठकों का दौर जारी है और विश्वविद्यालय परिसर के भीतर ही कुलपति डॉ. श्रीप्रकाश सिंह को हटाने की मांग भी धीरे-धीरे उठने लगी है।



Beauro Cheif



