नर्मदापुरम में बीजेपी पार्षद की दबंगई: निजी भूमि पर लगवाया टेलीकॉम टॉवर, खुद वसूल रही ₹12 हजार मासिक किराया।

नर्मदापुरम में बीजेपी पार्षद की दबंगई: निजी भूमि पर लगवाया टेलीकॉम टॉवर, खुद वसूल रही ₹12 हजार मासिक किराया।

नर्मदापुरम। पहले होशंगाबाद के नाम से पहचाना जाने वाला और अब नर्मदापुरम कहलाने वाला यह शहर धार्मिक आस्था के लिए जाना जाता है। नर्मदा तट पर बसे इस शहर में धार्मिक भावनाओं के चलते लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी को चुनावों में समर्थन मिलता रहा है। लेकिन अब उसी पार्टी के जनप्रतिनिधि पर आम नागरिक की जमीन पर कब्जा करने और उससे लाभ लेने के आरोप सामने आए हैं।

मामला शहर के ग्वालटोली क्षेत्र का है, जहां निवासी दुलारे यादव ने वार्ड क्रमांक 33 की पार्षद वंदना चुटीले पर उनकी निजी भूमि पर कब्जा कर टेलीकॉम टॉवर लगवाने का आरोप लगाया है। पीड़ित के अनुसार जिस जमीन पर टॉवर स्थापित किया गया है, उसके वैध दस्तावेज—रजिस्ट्री, खसरा और नक्शा—उनके पास मौजूद हैं। इसके बावजूद पार्षद द्वारा उक्त भूमि पर कब्जा कर टॉवर लगवा दिया गया और उससे करीब 12 हजार रुपये मासिक किराया भी वसूला जा रहा है।

बिना स्वामित्व के मिली अनुमति पर सवाल

पीड़ित का आरोप है कि टेलीकॉम टॉवर स्थापित करने के लिए कई स्तरों से अनुमति लेनी होती है, लेकिन इस मामले में कलेक्टर, तहसील और नगरपालिका से अनुमति मिलना कई सवाल खड़े करता है। सबसे गंभीर आरोप नगरपालिका के सीएमओ पर लगाया गया है, जिन्होंने कलेक्टर को भेजे गए अपने जवाब में पार्षद वंदना चुटीले को प्लॉट नंबर 3/21 अ का मालिक तक घोषित कर दिया।

कानूनी जानकारों के अनुसार नजूल भूमि से जुड़े मामलों में संपत्ति का मालिकाना हक केवल न्यायालय या नजूल अधिकारी ही तय कर सकते हैं, ऐसे में सीएमओ द्वारा स्वामित्व घोषित करना नियमों के विपरीत माना जा रहा है।

तहसील में 9 महीने तक चली पेशी, फिर मामला निरस्त

तहसील में अतिक्रमण की शिकायत 3 मार्च 2025 को दर्ज कराई गई थी। इसके बाद करीब 9 महीने तक पेशियां लगती रहीं, लेकिन 5 दिसंबर 2025 को नायब तहसीलदार हंसकुमार ओनकर ने यह कहते हुए प्रकरण निरस्त कर दिया कि आवेदक पक्ष पेशी पर उपस्थित नहीं हो रहा है।

पीड़ित पक्ष का आरोप है कि आदेश पत्र से पेशियों का रिकॉर्ड भी हटा दिया गया। रिकॉर्ड शीट में 5 अगस्त 2025 के बाद की पेशियों का उल्लेख नहीं है, जबकि पीड़ित के पास 12 अगस्त और 19 नवंबर को जारी नोटिस की प्रतियां मौजूद हैं। इन दस्तावेजों के अनुसार 12 अगस्त, 26 अगस्त, 19 नवंबर और 28 नवंबर 2025 को मामले में सुनवाई हुई थी। ऐसे में रिकॉर्ड शीट से जानकारी हटाए जाने को गंभीर अनियमितता बताया जा रहा है।

आरआई की रिपोर्ट भी संदेह के घेरे में

राजस्व निरीक्षक गजेंद्र जाटव की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। उन्होंने 20 मार्च 2025 को अपनी रिपोर्ट में उक्त भूमि पर टॉवर होने और उसकी जांच किए जाने की बात कही थी। लेकिन 6 मई 2026 को आरटीआई के जवाब में उन्होंने उसी जमीन पर टॉवर न होने की जानकारी दे दी।

पीड़ित ने 7 जुलाई 2025 को टॉवर की तस्वीरों के साथ दोबारा जानकारी मांगी, लेकिन 8 महीने बीतने के बाद भी आरटीआई का जवाब नहीं दिया गया।

शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं

दुलारे यादव का कहना है कि उन्होंने 12 मार्च 2025 और 20 अगस्त 2025 को नगरपालिका नर्मदापुरम में लिखित शिकायत दी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके अलावा सीएम हेल्पलाइन पर चार बार शिकायत दर्ज कराई गई।

जनसुनवाई में भी 11 मार्च, 18 मार्च और 19 अगस्त 2025 को शिकायत दर्ज की गई, जहां अधिकारियों ने जांच का आश्वासन दिया, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

नामांतरण प्रक्रिया भी अटकी

नजूल कार्यालय में नामांतरण की प्रक्रिया भी विवादों में है। सामान्यतः संपत्ति स्वामी की मृत्यु के बाद उसकी संतानों के नाम दर्ज करने की प्रक्रिया को नामांतरण कहा जाता है। पीड़ित के अनुसार इस मामले में लगभग आठ महीने तक पेशियां दी जाती रहीं, लेकिन अचानक मामले को निरस्त कर दिया गया और पक्षकार को अपना पक्ष रखने का अवसर भी नहीं दिया गया।

प्रशासन की भूमिका पर उठ रहे सवाल

पूरे मामले में नगरपालिका, तहसील और नजूल कार्यालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। एक ओर पीड़ित पक्ष के पास भूमि से जुड़े दस्तावेज मौजूद हैं, वहीं दूसरी ओर जनप्रतिनिधि को जमीन का मालिक बताकर टॉवर स्थापित होने देना प्रशासनिक पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है।

अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन इस मामले में निष्पक्ष जांच कर पीड़ित को न्याय दिला पाता है या नहीं।