आज ही के दिन अस्त हो गया भारतीय राजनीति के आकाश में चमकता धूमकेतु...

आज ही के दिन अस्त हो गया भारतीय राजनीति के आकाश में चमकता धूमकेतु...

विद्या भैया के पुण्यतिथि पर विशेष आलेख- ब्रजेश सतपथी
 
रायपुर(छत्तीसगढ़)।भारतीय राजनीति में विद्याचरण शुक्ल हमेशा मौजूद रहेंगे।मेरा छात्र राजनीति में कदम रखने के साथ ही एक इच्छा जो उस दौर में हर किसी के मन में हुआ करती थी।वह यह कि विद्या भैया मुझे भी नाम से जाने पहचाने की थी और मेरा उनके फॉर्म हॉउस में आना जाना लगे रहा।जोगी जी की सरकार बनने के बाद मैं भैया के काफी करीब आया यहाँ तक की कई मसले पर मेरी अकेले में उनसे चर्चा हुआ करती थी खास कर मिडिया में किस तरह का समाचार हमारे लिए फायदेमंद होगा और मैं उसी पर काम कर रहा था।वे मुझे काफी विश्वास किया करते और प्यार भी, मेरी शादी के समय वे रायपुर में नहीं थे,तो बाद में बकायदा मुझे सपत्नीक अपने यहाँ आमंत्रित कर भोजन कराये।मुझे बार-बार बोलते रहे मुझे भी भोजन में घर बुलाओ पर अफ़सोस की मैं उन्हें अपने घर में आज कल के चक्कर में कभी बुला न सका।

जगदलपुर की जीरम घाटी में 25 मई 2013 की दोपहर नक्सलियों की तीन जानलेवा गोलियों से छलनी ने चौरासी बरस के विद्याचरण शुक्ल 11 जून की दोपहर यानी पूरे 17 दिन तक मौत से जूझते रहे और मौत को गच्चा देते रहे लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उनका 57 बरस का राजनीतिक जीवन भी कमोबेश ऐसा ही था। मध्यप्रदेश और खासकर छत्तीसगढ़ की राजनीति पर 1957 से लेकर 1977 तक एकछत्र आधिपत्य के बाद उतार-चढ़ाव और मान-अपमान के दौर में लोगों ने उन्हें कभी थक कर घर बैठते नहीं देखा। विद्याचरण शुक्ल दोस्तों और दुश्मनों से जूझते रहे और विपरीत हालात को गच्चा देते रहे और खासतौर पर छत्तीसगढ़ की सियासत में अपनी प्रासंगिकता और अहमियत शिद्दत से जताते रहे। कोई कभी उन्हें नजरअंदाज़ नहीं कर सका।

विद्या सबके "भइया" थे रायपुर-भोपाल से लेकर नई दिल्ली तक अपना डंका बजाने वाले शुक्ल बंधुओं में छोटे विद्याचरण शुक्ल भोपाल और दिल्ली वालों के लिए ‘‘वीसी’’ थे। लेकिन रायपुर के बूढ़े-जवानों और बच्चों तक के लिए वे उम्र का आठवां दशक पार करने के बावजूद हमेशा विद्या भइया ही बने रहे। रायपुर और वहां के निवासी उनका विस्तारित परिवार था। वे रायपुर के असली नेता थे। बूढ़ापारा में उनके बंगले में जब भी विद्या भइया रायपुर में होते वह बंगला देर रात तक लोगों से गुलजार हुआ करता था। मैं जब से उन्हें जाना उनके बंगले से कभी किसी कार्यकर्ता या सामान्य व्यक्ति को निराश होकर या उन्हें कोसते हुए निकलते नहीं देखा, जैसा कि आज के नेताओं के बंगलों से बाहर निकलते हुए कार्यकर्ता और आमलोग दिखाई पड़ते हैं।

कॉलेज लाइफ में मैं जिस छात्र संगठन में काम करता था उसके नारों से बंगले की दीवारें गेरू से कई कई बार रंगीं लेकिन कभी किसी ने डांट-डपट नहीं की। रायपुर से जब भी कोई उनके पास काम कराने दिल्ली गया उन्होंने न केवल सबसे पहले उसका काम किया बल्कि उसके कुशल क्षेप की चिंता भी की।'लोगों का ख्याल' नक्सली हमले के शिकार बने विद्याचरण शुक्ल अपनी पार्टी का हो या विरोधी दल रायपुर का, हर शख्स उनके लिए अपना था। रायपुर और छत्तीसगढ़ के लोगों के जितने निजी-पारिवारिक काम उन्होंने किए उतने आज तक किसी नेता ने नहीं किए- वह भी बगैर कोई एहसान जताए।

उनके लिए रायपुर के किसी जनप्रतिनिधि का अपमान अपना अपमान था। विद्या भईया आपातकाल के दौर में दिल्ली में 'बदनाम चौकड़ी' का हिस्सा थे। इमरजेंसी में मीडिया पर ढाए गए हर कथित जुल्म के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाता है और शायद यह काफी हद तक सही भी है। भइया'नरम दिल के थे।' दरअसल शुक्ल व्यक्तिगत तौर पर जितने मुलायम और सौहार्द्र से भरे थे, एक नेता के बतौर उतने ही दबंग और कठोर थे। मृदुभाषी और सबके साथ निभा ले जाने वाले उनके बड़े भाई मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल के ठीक उलट उनका स्वभाव था,और नेता दबंग हो तो उसके कार्यकर्ता स्वच्छन्द हो जाते हैं। रायपुर के मतदाताओं को इसका अनुभव सबसे ज्यादा है। 

मेरी खोज में ये बात आई जब 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी प्रत्याशी का प्रचार करने उनके समर्थकों के दबदबे वाले मोहल्ले में उनके उद्दंड कार्यकर्ताओं ने सीपीआई के बुजुर्ग पूर्व विधायक सुधीर मुखर्जी और जनता पार्टी प्रत्याशी पुरुषोत्तम लाल कौशिक से न केवल मारपीट की बल्कि उनके कपड़े तक फाड़ दिये। केन्द्र की राजनीति में इंदिरा गांधी के इनर सर्कल में रहे विद्या भईया की राजीव गांधी से कभी नहीं बनी। 1989 में वी.पी. सिंह के जनता दल के एक अहम रचनाकार शुक्ल भी थे लेकिन उसकी टिकट पर जीतने के बावजूद वीपी सिंह ने उन्हें मंत्री नहीं बनाया। जब कांग्रेस में लौटे तो पीवी नरसिंह राव ने उनकी सुध ली लेकिन उसके बाद राज्य और केंद्र की राजनीति में वे धीरे-धीरे हाशिए पर ढकेले जाते रहे।

छत्तीसगढ़ राज्य बनने पर उसके पहले मुख्यमंत्री पद पर सबसे मजबूत दावा विद्या भईया का ही था लेकिन कांग्रेस आलाकमान की सरपरस्ती से छत्तीसगढ़ पर भेजे गए अजीत जोगी ने उन्हें किनारे कर दिया। 2004 का लोकसभा चुनाव उस भाजपा के टिकट पर विद्या भाई को लड़ना पड़ा जिससे वे जीवन भर लड़ते रहे। विद्या भईया अपने संध्याकाल में अपनी मूल पार्टी कांग्रेस में थे और तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद एक निष्ठावान कार्यकर्ता के रूप में पार्टी का काम कर रहे थे।लोगों ने नक्सल समस्या पर उनके कठोर बोल कभी नहीं सुने लेकिन नक्सलियों की गोलियों ने छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि पूरे देश की राजनीति के आकाश में लम्बे अरसे तक चमकते रहे एक धूमकेतु को अस्त कर दिया।