हेमचंद यादव विश्वविद्यालय के नए कुलपति संजय तिवारी की नियुक्ति को लेकर क्यों उठ रहे हैं सवाल!

हेमचंद यादव विश्वविद्यालय के नए कुलपति संजय तिवारी की नियुक्ति को लेकर क्यों उठ रहे हैं सवाल!

रायपुर(छत्तीसगढ़)। छत्तीसगढ़ के विश्वविद्यालयों में रिक्त कुलपतियों के पदों को भरे जाने का मामला अब एक कहानी की तरह हो गई है।जहाँ 6-6 महीने के बाद भी इस औपचारिकता को पूरी नहीं कि जा सकी है।विलंब को लेकर इतिहास बन चुके इन करणों को लेकर बुद्धिजीवी भी अब रिसर्च करने मजबूर हैं।इस बीच दुर्ग हेमचंद यादव विश्वविद्यालय में 6 माह बाद अचानक से ईद की छुट्टी के दिन प्रो.संजय तिवारी की नियुक्ति कुलपति के रूप में कर दी जाती है।जबकि इंदिरा गांधी कला विश्वविद्यालय और आईआईआईटी की चयन प्रक्रिया  23 दिसंबर 2024 से पूरी हो चुकी है।ऐसे में प्रो.संजय तिवारी की नियुक्ति अचानक से हो जाना कई सवालों को जन्म देता है।आखिर ऐसी क्या मजबूरी हो गई थी कि जो व्यक्ति वर्तमान में एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय भोपाल में पहले से ही कुलपति है और कुलपति के रूप में डेढ़ साल से भी ज्यादा समय अभी शेष है को फिर से एक बार छत्तीसगढ़ में मौका दे दिया गया।सूत्रों की माने तो यह तब और भी गंभीर हो जाती है जब 5 सदस्यीय पैनल में प्रतिभागी सम्मिलित हो और राजभवन के एक जिम्मेदार अधिकारी जो हाल ही में प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली से राजभवन में आया है से Unofficial मुलाकात करता है और सफ्ताह भर में उसी की नियुक्ति हो जाती है।आखिर इस मुलाकात के मायने क्या हैं?क्या कुलाधिपति इस बात से अनभिज्ञ थे या उनके निर्देश पर हुई!क्या यह मुलाकात भी नियुक्ति की कोई प्रक्रिया थी और थी तो क्या अन्य 4 सदस्य को भी यह मौका दिया गया।ऐसे कई सवाल हैं,जिनके उत्तर अभी मिलना शेष है।

हेमचंद यादव विश्वविद्यालय दुर्ग के नवनियुक्त कुलपति प्रो.संजय तिवारी वर्तमान में इसी पद पर मध्यप्रदेश भोज (ओपन) विश्वविद्यालय भोपाल में पदस्त हैं।जिनकी नियुक्ति वहाँ के वर्तमान कुलाधिपति ने माह सितंबर 2022 में 4 वर्ष के लिए की थी।इस तरह देखा जाए तो उनका कार्यकाल भोज विश्वविद्यालय में अभी भी डेढ़ वर्ष शेष है।संजय तिवारी की इस नियुक्ति ने वर्तमान में आसीन कई विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के लिए एक नए अवसर लेकर आया है।जरूरी नहीं कि आप एक ही विश्वविद्यालय में कार्यकाल पूर्ण करें।आप में अद्भुत योग्यता हो तो मनचाहे किसी भी विश्वविद्यालय में कभी भी कुलपति बन सकते हैं।भले ही उस राज्य के राजभवन को इसके लिए अनचाहे और समय पूर्व दो-दो बार उसी प्रक्रिया से गुजरना पड़े। जिसमें फिर से एक नए कुलपति की नियुक्ति करने जरूरत पड़ती है। आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन?

जानकारों का कहना है,कुलपति जैसा पद अब अपनी गरिमा खो चुका है।यह अब राजनीतिक नियुक्ति की तरह हो गई है।जिसकी जितनी ऊंची पहुंच उतनी उसकी पूछपरख के हिसाब से चल रही है। कुलपति के लिए गठित खोज समिति को भी इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि वे ऐसे व्यक्तियों का नाम पैनल में न सुझाएँ जो पहले से ही या वर्तमान में इस पद कर कार्य कर रहे हों। साथ ही साथ संबंधित विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति को भी विवेक से निर्णय लेने की जरूरत है कि आखिर एक ऐसे व्यक्ति को उसी पद पर नियुक्ति करने रुचि क्यों दिखाई जा रही है,जो पहले से ही इस पद में है। ऐसी स्थिति में यह जानना बेहद जरूरी है कि व्यक्ति विशेष द्वारा कोई गलत उद्देश्य की पूर्ति के लिए तो नहीं हो रहा है।क्या कुलपति के योग्य व्यक्ति कोई पहले से ही कुलपति हो वही हो सकता है।आखिर वह व्यक्ति एक विश्वविद्यालय को छोड़ कर दूसरे विश्वविद्यालय में उसी पद पर आना क्यों चाहता है।जबकि जहाँ वह वर्तमान में पदस्थ है वहां वह इसी बिना पर नियुक्ति ली थी कि वह अपने कार्यकाल को पूर्ण करेगा।

बहरहाल चर्चा इस बात की हो रही है कि आखिर प्रो.संजय तिवारी की नियुक्ति अचानक से कुलपति के रूप में कैसे हो गई?विश्वस्त सूत्रों के हवाले से खबर है कि प्रो.तिवारी 22 मार्च से 24 मार्च के बीच रायपुर में थे।इस बीच राजभवन के एक जिम्मेदार अधिकारी जो हाल ही में दिल्ली से प्रतिनियुक्ति पर राजभवन आए हैं,जिन्हें कई तो इन्हें पॉवर सेंटर के नाम से भी बोलने लगे हैं,ने विश्वविद्यालय संवर्ग के एक सरकारी अधिकारी के माध्यम से प्रो.तिवारी को संपर्क साधने के निर्देश दिए।यह मुलाकात का वह हिस्सा था जो unofficial था।सूत्र यह भी बताते हैं कि प्रो.तिवारी की मुलाकात उस अधिकारी से हुई और अच्छे से हुई और उसी समय तय हो गया था कि उनकी नियुक्ति पक्की है और इस शुभ घड़ी के लिए छुट्टी का दिन ईद को चुना गया।अभी तक इस बात की जानकारी नहीं मिली है कि आखिर इस मुलाकात में किन योजनाओं को लेकर चर्चा हुई।अन्य विश्वविद्यालय के प्रतिभागी भी इस तरह की मुलाकात का अवसर तलास रहे हैं।