दुर्ग विश्वविद्यालय के कुलपति का आदेश ही गलत! कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी...।

दुर्ग(छत्तीसगढ़)।काफी अर्से बाद छुट्टी के दिन अचानक से दुर्ग हेमचंद यादव विश्वविद्यालय के नए कुलपति का आदेश तो जारी कर दिया गया है।परंतु यह आदेश हड़बड़ी में जारी किया गया प्रतीत होता है।दरअसल इस आदेश के शब्दों में ही विसंगति दिखाई देती है।एक तो यह कि इस आदेश में प्रो.संजय तिवारी को कुलपति नहीं बल्कि भोज विश्वविद्यालय के कुलपति को दुर्ग विवि का कुलपति नियुक्त किया गया है।जिन्हें वहां विधिवत इस्तीफा देना होगा।तब वे भोज विवि के कुलपति नहीं सिर्फ प्रोफेसर ही रह जाएंगे। इसके बाद अपने मूल विभाग पं रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के तौर पर जॉइनिंग भी लेनी होगी।जहां लीन पर उन्हें जाना होगा।ऐसे में वे दुर्ग विश्वविद्यालय के कुलपति तब तक हैं,जब तक वे भोज विश्वविद्यालय भोपाल के कुलपति हैं।
हेमचंद यादव दुर्ग विश्वविद्यालय के नए कुलपति का मामला उलझते ही जा रहा है।जानकारों का मानना है कि यह आदेश ही गलत जारी हुआ है,जो कोर्ट में चुनौती का कारण बन सकता है।जानकार मानते हैं,आदेश में एक कुलपति को कुलपति नियुक्त करने का आदेश है और जब वह व्यक्ति वर्तमान पद कुलपति से इस्तीफा दे देगा तो वह सिर्फ प्रोफेसर ही रह जायेगा।असल में आदेश में यह सही होता जब इस बात का उल्लेख होता कि प्रो.संजय तिवारी को दुर्ग विवि का कुलपति नियुक्त किया जाता है,जो वर्तमान में भोज विश्वविद्यालय के कुलपति हैं।इस आदेश में राज्यपाल शब्द का भी उपयोग हुआ है,जो भी गलत है।किसी भी विश्वविद्यालय के लिए पदेन राज्यपाल ही कुलाधिपति होते हैं।परंतु कुलपति की नियुक्ति का अधिकार सिर्फ कुलाधिपति को होता है।इसलिए राज्यपाल शब्द को इस तरह के आदेश में विलोपित रखा जाता है।जबकि इस आदेश में राज्यपाल शब्द का भी उल्लेख है।
जानकार यह भी बता रहे हैं कि इस आदेश में कार्यकाल की अवधि व उम्र का उल्लेख भी नहीं होना गलत है।भले ही यह विश्वविद्यालय के धाराओं के अधीन हो परंतु इस बीच कहीं इसमें कोई संशोधन होता है,जैसे कि छत्तीसगढ़ के विश्वविद्यालयों में पहले कुलपति का कार्यकाल 4 वर्ष का था,जिसे संशोधित कर बाद में 5 वर्ष किया गया।इसी तरह उम्र सीमा को लेकर भी संशोधन हुआ है।इन परिस्थितियों में फिर से कोई संशोधन होता है तो इस आदेश पर संवैधानिक संकट आ सकती है।छत्तीसगढ़ के शिक्षा विद इस बात को लेकर भी अपनी आपत्ति दर्ज कर रहे हैं,की जिस व्यक्ति का कार्यकाल वर्तमान विश्वविद्यालय में कुलपति के तौर पर 18 माह शेष है ऐसे व्यक्ति को उपकृत करने के क्या मायने हैं।क्या वह व्यक्ति इतना योग्य है।क्या वह खोज समिति के पैनल में सबसे टॉप पर था या कोई गुप्त योग्यता है जो अन्य सदस्यों के हैसियत से परे थी।बहरहाल इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी हो गई है।
उदाहरण के तौर पर मध्यप्रदेश के एक विश्वविद्यालय का आदेश जहाँ वहां के कुलाधिपति ने जारी किया था-