कुलपति चयन पर सवाल: क्या छत्तीसगढ़ में बाहरी दबाव के आगे झुक गया सिस्टम? रायगढ़ में विनय चौहान की नियुक्ति लगभग तय...!
रायपुर/रायगढ़। छत्तीसगढ़ के विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्ति की प्रक्रिया अब गंभीर विवादों के घेरे में है। स्थानीय बनाम बाहरी के मुद्दे के बीच जो हालात बन रहे हैं, वे यह संकेत दे रहे हैं कि राज्य का पूरा सिस्टम बाहरी दबाव के आगे नतमस्तक होता नजर आ रहा है। रायगढ़ स्थित शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय में जम्मू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विनय चौहान की नियुक्ति लगभग तय मानी जा रही है, जिसकी औपचारिक घोषणा कभी भी हो सकती है।
_विधानसभा में उठी आवाज, लेकिन जमीन पर उलट तस्वीर-_
हाल ही में विधानसभा में भाजपा के वरिष्ठ विधायक अजय चंद्राकर ने बाहरी व्यक्तियों को कुलपति बनाए जाने का मुद्दा जोर-शोर से उठाया था। उनके इस बयान के बाद स्थानीय प्राध्यापकों और शिक्षाविदों में उम्मीद जगी कि अब प्रदेश के योग्य शिक्षकों को प्राथमिकता मिलेगी। इस मुद्दे पर शिक्षा जगत और स्थानीय बुद्धिजीवियों ने भी खुलकर समर्थन किया, क्योंकि उनका तर्क स्पष्ट रूप से स्थानीय प्राध्यापकों के पक्ष में था। इससे शिक्षकों में यह विश्वास जगा कि उनकी योग्यता को पहली बार गंभीरता से लिया जा रहा है।
लेकिन अब जो संकेत सामने आ रहे हैं, वे इन उम्मीदों के ठीक विपरीत हैं और यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या राजनीतिक बयानबाजी और वास्तविक फैसलों में गहरा अंतर है?
_शुरुआत से ही “फिक्स” थी नियुक्ति?_
सूत्रों के अनुसार, चयन प्रक्रिया के शुरुआती चरण से ही प्रो. विनय चौहान का नाम सबसे आगे रहा। यहां तक कि 24 नवंबर 2025 को तत्कालीन कुलपति प्रो. पटेरिया का कार्यकाल समाप्त होते ही उनकी नियुक्ति लगभग तय मानी जा रही थी। हालांकि, किसी कारणवश यह फैसला उस समय टल गया। इसके बाद से कथित तौर पर दबाव और लॉबिंग का दौर और तेज हो गया।
_राज्यपाल को हटाने की मुहिम से जुड़ने की चर्चा-_
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे गंभीर और चौंकाने वाली बात यह सामने आ रही है कि नियुक्ति टलने के बाद प्रो. चौहान इस कदर नाराज़ हुए की कथित रूप से उस मुहिम से भी जुड़ गए, जिसमें छत्तीसगढ़ के राज्यपाल को हटाने की चर्चाएं शुरू हो गई। सूत्रों के मुताबिक, एक रणनीति के तहत इस मुद्दे को प्रचारित भी किया गया और दिल्ली स्तर पर सक्रियता बढ़ाई गई। हाल ही में जब विभिन्न राज्यों के राज्यपालों को लेकर अटकलें तेज हुईं, तब इस पूरे घटनाक्रम पर चौहान खेमे की नजर टिकी रही।
हालांकि इस चरण में उन्हें सफलता नहीं मिली, लेकिन अब यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि पांच राज्यों के चुनाव के बाद इस दिशा में फिर से बदलाव हो सकते हैं। इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक और शैक्षणिक गलियारों में यह चर्चा तेजी से फैल रही है, जिससे पूरा मामला और संवेदनशील हो गया है।
_दिल्ली से रायपुर तक सक्रिय नेटवर्क-_
जानकारी के अनुसार, प्रो. चौहान पिछले कई महीनों से दिल्ली से लेकर रायपुर तक सक्रिय हैं और सत्ता व संगठन से जुड़े प्रभावशाली लोगों के संपर्क में बने हुए हैं। यह भी कहा जा रहा है कि उन्हें विश्वविद्यालय की आंतरिक गतिविधियों की नियमित जानकारी भी मिल रही है, जिससे यह धारणा मजबूत हो रही है कि पूरी प्रक्रिया पर बाहरी प्रभाव हावी है।
बताया जाता है कि उन्होंने अपने संपर्कों के जरिए यह संदेश भी देने की कोशिश की है कि नियुक्ति के बाद वे स्वतंत्र रूप से काम करते हुए खुद को स्थानीय उम्मीदवारों से बेहतर साबित करेंगे। सूत्रों का दावा है कि उन्हें यह भी जानकारी है कि प्रदेश में किन लोगों की बात प्रभावी मानी जाती है। इसी आधार पर उन्होंने दूर बैठकर रणनीतिक तरीके से अपनी पकड़ मजबूत की—और अब वे अपने लक्ष्य के करीब नजर आ रहे हैं।
_राजकीय विश्वविद्यालय का मूल उद्देश्य: स्थानीय शिक्षाविदों को प्राथमिकता देना होता है-_
किसी भी राज्य में राजकीय विश्वविद्यालयों की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य वहां के स्थानीय शिक्षाविदों को प्राथमिकता देना होता है। यह केवल नियुक्ति का प्रश्न नहीं, बल्कि राज्य के समग्र शैक्षणिक विकास से जुड़ा विषय है। मध्यप्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और उत्तरप्रदेश जैसे कई राज्यों में यह परंपरा देखने को मिलती है कि कुलपति के रूप में उन्हीं प्राध्यापकों को प्राथमिकता दी जाती है, जो राज्य के भीतर अध्यापन कार्य कर रहे होते हैं। इसका कारण स्पष्ट है—ऐसे शिक्षाविद राज्य की अधोसंरचना,सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश और स्थानीय आवश्यकताओं को बेहतर तरीके से समझते हैं।स्थानीय पृष्ठभूमि से जुड़े कुलपति विश्वविद्यालय के विकास को राज्य की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप दिशा दे सकते हैं, जिससे शिक्षा व्यवस्था अधिक प्रासंगिक और प्रभावी बनती है।
इसके विपरीत, केंद्रीय विश्वविद्यालयों की अवधारणा राष्ट्रीय स्तर की होती है, जहां देशभर के श्रेष्ठ शिक्षाविदों को अवसर दिया जाता है, ताकि विविध अनुभव और व्यापक दृष्टिकोण का लाभ संस्थान को मिल सके। इसलिए यह आवश्यक है कि राजकीय विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों के समय स्थानीय अनुभव और राज्य की समझ को प्राथमिकता दी जाए, ताकि शिक्षा का विकास जमीनी स्तर पर सशक्त हो सके।
_विपक्ष का हमला, बहस और तेज-_
कांग्रेस ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की तैयारी कर ली है। पार्टी नेताओं का कहना है कि छत्तीसगढ़ में योग्य और अनुभवी प्राध्यापकों की कोई कमी नहीं है, फिर भी बाहरी व्यक्तियों को प्राथमिकता दी जा रही है। कांग्रेस के प्रदेश महामंत्री सुबोध हरितवाल ने स्पष्ट कहा है कि यदि स्थानीय प्रतिभाओं की अनदेखी कर बाहरी व्यक्ति को कुलपति बनाया जाता है, तो इसका कड़ा विरोध किया जाएगा।



Beauro Cheif



