वित्तीय वर्ष के आखिरी दिनों में रायगढ़ विवि में ‘खरीदी का खेल’! प्रो. पटेरिया पर गंभीर आरोप, कार्यपरिषद को गुमराह कर पास कराए कई लाखों के प्रस्ताव..!

वित्तीय वर्ष के आखिरी दिनों में रायगढ़ विवि में ‘खरीदी का खेल’! प्रो. पटेरिया पर गंभीर आरोप, कार्यपरिषद को गुमराह कर पास कराए कई लाखों के प्रस्ताव..!

रायगढ़ (छत्तीसगढ़)। वित्तीय वर्ष के अंतिम चरण में रायगढ़ विश्वविद्यालय में कथित वित्तीय अनियमितताओं ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। कुलपति प्रो. पटेरिया पर आरोप है कि वे कार्यकाल समाप्ति के बाद भी विश्वविद्यालय की निधि का ताबड़तोड़ उपयोग कर रहे हैं और कार्यपरिषद को गलत जानकारी देकर भारी-भरकम खरीदी के प्रस्ताव पास करा रहे हैं।सूत्र बता रहे हैं, प्रो.पटेरिया को संरक्षण देने वाले एक अधिकारी का नाम भी सामने आया है,जिसकी शिकायत शासन तक पहुंचने की खबर है।

सूत्रों के मुताबिक, हाल ही में आयोजित कार्यपरिषद की बैठक में कई लाख रुपये की खरीदी को मंजूरी दी गई, वह भी इस तर्क के साथ कि यदि 31 मार्च तक राशि खर्च नहीं हुई तो वह शासन को वापस चली जाएगी। जबकि विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि विश्वविद्यालय के कोष में जमा राशि लेप्स नहीं होती, बल्कि अगले वित्तीय वर्ष में भी सुरक्षित रहती है।

महीने में तीन-तीन बैठकें, खर्च लाखों में

आरोप यह भी है कि प्रो. पटेरिया एक ही महीने में कार्यपरिषद की तीन बैठकें आयोजित कर चुके हैं, जो सामान्य परंपरा के विपरीत है। आमतौर पर ऐसी बैठकें महीने में एक बार या उससे भी कम होती हैं। हर बैठक में सदस्यों को 10 हजार रुपये मानदेय और 5 हजार रुपये तक के उपहार दिए जा रहे हैं, जिससे एक बैठक का खर्च लाखों में पहुंच रहा है।

ऑनलाइन सहमति से पास हो रहे प्रस्ताव, वैधता पर सवाल

सबसे गंभीर सवाल कार्यपरिषद की बैठक प्रक्रिया को लेकर उठ रहे हैं। जानकारी के अनुसार, बैठक में महज 2-4 सदस्य भौतिक रूप से उपस्थित रहते हैं, जबकि बाकी सदस्यों से ऑनलाइन सहमति लेकर प्रस्ताव पास कर दिए जाते हैं।बजट पर चर्चा भला ऑनलाइन कैसे हो सकती है।नियमों के जानकार इसे पूरी तरह अवैधानिक बता रहे हैं और ऐसे निर्णयों को न्यायालय में चुनौती दिए जाने की संभावना जता रहे हैं।

क्या कार्यपरिषद के विधायक सदस्यों ने ऑनलाइन बैठक में सम्मिलित होने विधानसभा अध्यक्ष से अनुमति ली थी!-

शहीद नंदकुमार पटेल विवि रायगढ़ में 4 विधायक भी कार्यपरिषद के सदस्य हैं और प्रो पटेरिया द्वारा रखी गई अभी के सभी बैठक के कालखंड में वे विधानसभा की कार्यवाही में सम्मिलित थे,ऐसे में जब उनसे ऑनलाइन जुड़ कर कुलपति पटेरिया अभिमत ले रहे थे,तो क्या उन विधायकों को विधानसभा के अध्यक्ष की अनुमति थी? क्या उन्हें सदन की कार्यवाही के बीच अन्य किसी संवैधानिक बैठक में एक साथ सम्मिलित होने लिंग प्रोवाइड किये गए थे? यह एक जांच का गंभीर विषय है। एक साथ दो संवैधानिक बैठकों में एक व्यक्ति कैसे अपनी उपस्थिति की अनुमति ले सकता है,तो क्या कुलपति पटेरिया की यह भी एक सोची समझी चाल थी।

‘भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा उदाहरण’?

विवि के भीतर ही इस पूरे घटनाक्रम को “अब तक का सबसे बड़ा वित्तीय दुरुपयोग” बताया जा रहा है। आरोप यह भी है कि संभावित जांच से बचने के लिए कार्यपरिषद के सदस्यों को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया जा रहा है, ताकि जवाबदेही साझा हो सके।रायगढ़ से लेकर रायपुर तक चर्चा यह भी हो रही है,की एक संवैधानिक संस्था का अधिकारी प्रो.पटेरिया को संरक्षण दे रहा है।कार्यकाल समाप्ति के बाद कार्य करने की छूट भी इसी अधिकारी की वजह से मिला हुआ है।सूत्र यह भी बता रहे हैं,उस अधिकारी का नाम सामने आने के बाद खलबली मच गई है और कुछ नेताओं ने शासन के शीर्ष नेतृत्व तक यह बात पहुंचा दी है।

अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या शासन इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच करेगा या फिर विश्वविद्यालय की यह कथित मनमानी यूं ही चलती रहेगी?