शहीद नंदकुमार पटेल विवि:कार्यकाल समाप्ति के बाद भी वित्तीय फैसले, सरकार की चुप्पी पर उठे सवाल

क्या नियमों से ऊपर है कुलपति पद? विश्वविद्यालय प्रशासन पर गहराता विवाद

शहीद नंदकुमार पटेल विवि:कार्यकाल समाप्ति के बाद भी वित्तीय फैसले, सरकार की चुप्पी पर उठे सवाल

रायगढ़। शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय एक बार फिर प्रशासनिक और वित्तीय निर्णयों को लेकर सुर्खियों में है। कुलपति प्रो. ललित प्रकाश पटेरिया का नियमित कार्यकाल समाप्त हो जाने के बावजूद लगातार वित्तीय निर्णय लिए जाने की खबरों ने विश्वविद्यालय जगत और राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। चर्चा इस बात की भी है कि जिस गति और स्तर पर निर्णय लिए जा रहे हैं, उतनी सक्रियता प्रदेश के अन्य कार्यरत कुलपति भी शायद ही दिखा पा रहे हों।

सूत्रों के अनुसार, कार्यकाल समाप्ति के बाद भी विभिन्न मदों में स्वीकृतियाँ, भुगतान आदेश और प्रशासनिक अनुमोदन जारी किए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि आगामी पाँच वर्षों के लिए उत्तरपुस्तिकाओं की खरीदी संबंधी निर्णय ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि दीर्घकालिक वित्तीय प्रतिबद्धताएँ उस समय क्यों और किस अधिकार से ली जा रही हैं, जब नियमित कार्यकाल पूर्ण हो चुका है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे महत्वपूर्ण और दूरगामी वित्तीय निर्णय या तो कार्यकाल के दौरान लिए जाने चाहिए थे, या फिर नए कुलपति के पदभार ग्रहण करने के बाद। हैरानी की बात यह है कि इन निर्णयों के समर्थन में किसी अधिकृत कार्यकाल विस्तार या विशेष शासनादेश की स्पष्ट प्रति सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है।

कानूनी दृष्टि से देखा जाए तो विश्वविद्यालय अधिनियम और वित्तीय नियमों के तहत पद पर बने रहने अथवा नीतिगत एवं वित्तीय निर्णय लेने के लिए विधिवत प्रशासनिक स्वीकृति आवश्यक मानी जाती है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि कार्यकाल समाप्त हो चुका है, तो निर्णय लेने का अधिकार किस आधार पर प्रयोग किया जा रहा है?

राजनीतिक और शैक्षणिक हलकों में सरकार की चुप्पी को लेकर भी चर्चाएँ तेज हैं। यदि सभी निर्णय नियमसम्मत हैं, तो शासन स्तर से स्पष्टिकरण जारी कर स्थिति साफ की जानी चाहिए। अन्यथा यह धारणा बन रही है कि व्यवस्था पर नियंत्रण कमजोर पड़ रहा है और जवाबदेही तय नहीं हो पा रही है।

विश्वविद्यालय से जुड़े प्राध्यापक और कर्मचारी पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि उच्च शिक्षा संस्थानों की साख नियम आधारित प्रशासन और जवाबदेही पर ही टिकी होती है। ऐसे में शासन और राजभवन दोनों की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है।

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या शीघ्र ही नए कुलपति की नियुक्ति का आदेश जारी होगा, या शासन स्तर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आएगा। अन्यथा यह प्रकरण भी समय के साथ अन्य विवादों की तरह ठंडा पड़ सकता है—लेकिन उससे पहले यह सवाल जरूर छोड़ जाएगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन में अंतिम जवाबदेही किसकी है।