“क्या विश्वविद्यालय अब सेवानिवृत्तों का पुनर्वास केंद्र बन रहे हैं?”
रायपुर (छत्तीसगढ़)।प्रदेश के विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्ति को लेकर एक नई परंपरा की शुरुआत हुई है। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में हाल ही में एक ऐसे प्राध्यापक को कुलपति नियुक्त किया गया है, जो सात महीने पहले ही सेवानिवृत्त हुए हैं। अब सवाल सीधा है —क्या विश्वविद्यालयों में अब सक्रिय, ऊर्जावान, शोधरत प्राध्यापकों की कमी हो गई है? या फिर सेवानिवृत्ति अब सिर्फ “नई पारी” की तैयारी है?
जानकारी के अनुसार, सर्च कमेटी ने तीन उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया था, जिनमें दो पहले से सेवानिवृत्त थे। प्रश्न यह उठता है कि क्या कुलपति जैसे महत्वपूर्ण पद के लिए सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्ति एक नई नीति का संकेत है? यदि हाँ, तो क्या इसके स्पष्ट मानदंड सार्वजनिक किए गए हैं? यह भी चर्चा में है कि पैनल में शामिल एक अन्य उम्मीदवार की प्राध्यापक के रूप में सेवा अवधि को लेकर सवाल उठे। कुलपति पद हेतु निर्धारित पात्रता शर्तों पर पारदर्शिता आवश्यक है, ताकि शंकाओं की गुंजाइश न रहे।
जब सर्च कमेटी केवल तीन नामों का पैनल बनाती है, और उनमें भी पात्रता व अनुभव को लेकर चर्चा उठती है, तो पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न स्वाभाविक है। कुलपति जैसे संवैधानिक पद पर नियुक्ति केवल प्रक्रिया नहीं, बल्कि शैक्षणिक भविष्य का निर्धारण है।स्थानीय योग्य प्राध्यापकों की अनदेखी क्या संदेश देती है? क्या राज्य की प्रतिभा पर भरोसा कम है? या नियुक्ति की कसौटी कुछ और है, जो सार्वजनिक नहीं की जाती?
प्रो. मनोज दयाल, जो पूर्व में गुरु जम्भेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से जुड़े रहे, अब छत्तीसगढ़ के विश्वविद्यालय की बागडोर संभालेंगे। उनका अनुभव निश्चित ही महत्वपूर्ण है — पर क्या चयन की पूरी प्रक्रिया भी उतनी ही स्पष्ट है? विश्वविद्यालय विचारों के मंदिर होते हैं, अवसरों के मंच होते हैं — यदि वही निर्णयों की अपारदर्शिता से घिर जाएँ, तो युवा पीढ़ी क्या सीखेगी?
क्या छत्तीसगढ़ के विश्वविद्यालय अब प्रतिभा के केंद्र नहीं, बल्कि “सेवानिवृत्त व्यवस्था” के विस्तार बनते जा रहे हैं?कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में हालिया कुलपति नियुक्ति ने कई असहज प्रश्न खड़े कर दिए हैं। राज्य में योग्य, कार्यरत, शोधरत प्राध्यापकों की कमी नहीं है — फिर भी बाहर से, सेवानिवृत्त व्यक्तियों को शीर्ष पद सौंपने की जल्दबाज़ी क्यों? क्या यह संदेश नहीं देता कि स्थानीय अकादमिक नेतृत्व पर भरोसा कम है? या फिर विश्वविद्यालयों को अनुभव के नाम पर “पोस्ट-रिटायरमेंट प्लेसमेंट” का मंच बना दिया गया है?



Beauro Cheif



