कुलपति की कुर्सी और तीसरी पारी की चाह! बिलासपुर विवि चयन प्रक्रिया के पैनल में उम्र 66 पार.. नाम से बढ़ी सरगर्मी...!
बिलासपुर। अटल बिहारी बाजपेयी विश्वविद्यालय में नए कुलपति की नियुक्ति को लेकर इस बार की प्रक्रिया ने अकादमिक जगत के साथ-साथ प्रशासनिक गलियारों में भी हलचल बढ़ा दी है। खोजबीन समिति द्वारा तैयार किए गए चार नामों के पैनल में एक ऐसा नाम शामिल होने की चर्चा है, जिसने विश्वविद्यालयों की राजनीति को फिर से सुर्खियों में ला दिया है।
सूत्रों के अनुसार इस पैनल में दो नाम छत्तीसगढ़ से और दो अन्य राज्यों के प्राध्यापकों के बताए जा रहे हैं। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा जिस नाम की हो रही है, वह 66 वर्ष से अधिक आयु के एक सेवानिवृत्त पूर्व कुलपति का है। यदि उन्हें मौका मिलता है तो वे तीसरी बार कुलपति बनने का रिकॉर्ड बना सकते हैं। हालांकि छत्तीसगढ़ विश्वविद्यालय अधिनियम के अनुसार कुलपति पद के लिए अधिकतम आयु सीमा 70 वर्ष है, ऐसे में उनका कार्यकाल अधिकतम साढ़े तीन वर्ष तक ही सीमित रह जाएगा।
गौरतलब है कि अटल बिहारी बाजपेयी विश्वविद्यालय में पिछले कुलपति का कार्यकाल 22 फरवरी को समाप्त हो चुका है। इसके बाद गठित खोजबीन समिति ने 3 मार्च को करीब 20 उम्मीदवारों को लोक भवन में इंटरेक्शन के लिए बुलाया था। इनमें से चार उम्मीदवार अनुपस्थित रहे, जबकि शेष 16 ने समिति के सामने अपनी प्रस्तुति दी।
विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि अंतिम पैनल में शामिल स्थानीय नामों में प्रोफेसर बी.जी. सिंह का नाम भी है, जो पंडित सुंदरलाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय,बिलासपुर में लगातार दो बार कुलपति रह चुके हैं। सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका सक्रिय रहना और एक बार फिर कुलपति पद की दौड़ में शामिल होना कई लोगों को चौंका रहा है।
बताया जाता है कि प्रो. सिंह अपने राजनीतिक संपर्कों के कारण भी चर्चित रहे हैं और समय-समय पर इन संपर्कों की झलक भी दिखाई देती रही है। यही वजह है कि इस बार भी उन्होंने बिलासपुर विश्वविद्यालय के लिए आवेदन किया और कई स्थानीय उनसे कम उम्र के प्राध्यापकों को पीछे छोड़ते हुए चयन प्रक्रिया के पैनल तक पहुंचने में सफल हो गए।
उनके पिछले कार्यकाल को लेकर भी समय-समय पर चर्चा होती रही है। पंडित सुंदरलाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय में उनके कार्यकाल के दौरान निर्माण कार्यों और नियुक्तियों को लेकर कई सवाल उठे थे। आलोचकों का कहना है कि मुक्त विश्वविद्यालय की प्रकृति को देखते हुए भी कई ऐसे निर्माण कार्य कराए गए जिनकी आवश्यकता थी ही नहीं, जैसे ऑडिटोरियम और अन्य ढांचे।
नियुक्तियों के मामले में भी यह चर्चा रही कि कई पदों पर भर्ती की गई, जबकि विश्वविद्यालय को उनकी आवश्यकता नहीं थी। कुछ मामलों में सरकार की अनुमति न मिलने के बावजूद सेल्फ फाइनेंस योजना के तहत नियुक्तियां कर अपनी जिद पूरा किए जाने की बात भी सामने आई थी। आज स्थिति यह बताई जाती है कि वहां न तो कोई पद रिक्त है और न ही नए निर्माण के लिए पर्याप्त स्थान बचा है।इससे इतर विवि में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने को लेकर कोई ठोस प्रयास नहीं हुआ।
इधर अकादमिक हलकों में यह सवाल भी उठ रहा है कि जब विश्वविद्यालयों में नई पीढ़ी के शिक्षाविदों को अवसर देने की बात की जाती है, तो फिर ऐसे सेवानिवृत्त प्राध्यापक को कुलपति नियुक्त करने का औचित्य क्या होगा, जिसके पास पूरा पांच वर्ष का कार्यकाल देने की आयु भी शेष नहीं है।
हालांकि अंतिम निर्णय कुलाधिपति के हाथ में है। जानकारों का मानना है कि अब तक की कार्यप्रणाली को देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि वे किसी भी प्रकार के दबाव में निर्णय लेंगे। कई बुद्धिजीवियों का मानना है कि वर्तमान राज्यपाल अपने निर्णयों में स्वतंत्रता के लिए जाने जाते हैं और वे दबाव में काम करने के बजाय अपने विवेक से फैसले लेने के लिए पहचाने जाते हैं।



Beauro Cheif



