छत्तीसगढ़ में “5 साल से अधिक” के कुलपति! नियमों से खिलवाड़ या संरक्षण की राजनीति?
रायपुर (छत्तीसगढ़)। प्रदेश के राजकीय विश्वविद्यालयों में कुलपतियों का कार्यकाल अब नियमों से नहीं, बल्कि “प्रभाव और संरक्षण” से तय होता दिख रहा है। वैधानिक रूप से 5 वर्ष की अधिकतम सीमा होने के बावजूद कई कुलपति इस अवधि से आगे भी पद पर बने हुए हैं, जिससे पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हालात ऐसे हैं कि अब इनकी तुलना राज्यसभा सांसदों के 6 साल के कार्यकाल से की जाने लगी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किसके संरक्षण में यह “अघोषित विस्तार” दिया जा रहा है? क्या यह व्यवस्था किसी खास व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के लिए बनाई गई है?
इस पूरे विवाद के केंद्र में शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय, रायगढ़ के कुलपति प्रो. पटेरिया हैं। आरोप है कि उन्होंने अपना नियमित कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी न केवल कुर्सी संभाले रखी, बल्कि करोड़ों रुपये के वित्तीय फैसले भी ले डाले। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि उत्तरपुस्तिकाओं की भारी खरीदी ऐसे समय में की गई, जब विश्वविद्यालय में पहले से ही पर्याप्त स्टॉक मौजूद बताया जा रहा है।
सवाल उठता है—क्या यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही है, या फिर सुनियोजित आर्थिक खेल?
हैरानी की बात यह भी है कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद सरकार की ओर से न तो कोई सख्त कदम उठाया गया और न ही जवाबदेही तय की गई। क्या यह चुप्पी किसी बड़े संरक्षण की ओर इशारा नहीं करती?
छत्तीसगढ़ विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 में संशोधन के बाद कुलपतियों का कार्यकाल 4 से बढ़ाकर 5 वर्ष किया गया था। लेकिन अब जो स्थिति बन रही है, वह इस कानून की मंशा को ही चुनौती देती नजर आ रही है। हाल के वर्षों में, विशेषकर नए राज्यपाल के कार्यकाल के दौरान, यह “अघोषित विस्तार” आम होता जा रहा है।
अगर देश के अन्य राज्यों पर नजर डालें, तो उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, बिहार और ओडिशा जैसे राज्यों में कुलपतियों का कार्यकाल सामान्यतः 3 वर्ष तक सीमित रहता है। ऐसे में छत्तीसगढ़ का यह मॉडल कई सवाल खड़े करता है—क्या यहां नियम अलग हैं, या फिर उन्हें अलग तरीके से लागू किया जा रहा है?
प्रो. पटेरिया का मामला इस बहस को और भड़का रहा है। उनकी नियुक्ति से लेकर अब तक का सफर लगातार विवादों में रहा है, मूल झांसी उत्तरप्रदेश के पटेरिया की नियुक्ति जब गुरु घांसीदास विवि बिलासपुर में सहायक प्राध्यापक के रूप में हुई थी तो उनकी नियुक्ति को लेकर भी सवाल उठे थे(अगले अंक में विस्तार से) परंतु मैनेजमेंट में माहिर ये प्रोफेसर तक पहुंच गए और अब कुलपति। लेकिन इसके बावजूद उनका पद पर बने रहना यह संकेत देता है कि सिस्टम में कहीं न कहीं गंभीर खामी है—या फिर जानबूझकर आंखें मूंदी जा रही हैं।
सबसे अहम सवाल यही है—
क्या छत्तीसगढ़ में विश्वविद्यालय अब शैक्षणिक संस्थान कम और सत्ता संरक्षित तंत्र ज्यादा बनते जा रहे हैं?
यदि समय रहते इस पर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह केवल एक विश्वविद्यालय का नहीं, बल्कि पूरे उच्च शिक्षा तंत्र की साख का सवाल बन जाएगा।



Beauro Cheif



