लोक भवन की विशेष कृपा या रणनीतिक प्रभाव? बिलासपुर विवि कुलपति चयन में प्रो. पटेरिया चर्चा के केंद्र में..!

शॉर्टलिस्टिंग से इंटरैक्शन तक बदले समीकरण, अंतिम पैनल को लेकर अटकलें तेज।

लोक भवन की विशेष कृपा या रणनीतिक प्रभाव? बिलासपुर विवि कुलपति चयन में प्रो. पटेरिया चर्चा के केंद्र में..!

बिलासपुर। अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय में कुलपति चयन प्रक्रिया को लेकर अकादमिक और राजनीतिक हलकों में सरगर्मी तेज हो गई है। 3 मार्च को आयोजित हुए इंटरैक्शन के लिए बुलाए गए 20 उम्मीदवारों में शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय रायगढ़ के कुलपति प्रो. ललित प्रकाश पटेरिया का नाम शामिल है। सूत्रों के अनुसार अंतिम 3 या 5 नामों के पैनल में उनका नाम प्रमुखता से ऊंचे क्रम में रह सकता है।

वर्तमान में पांच साल का कार्यकाल शून्य, फिर भी मजबूत दावेदारी

रायगढ़ विश्वविद्यालय में प्रो. पटेरिया का पांच वर्षीय कार्यकाल पूरा हो चुका है। आलोचकों का आरोप है कि इस अवधि में उल्लेखनीय शैक्षणिक उपलब्धियां सामने नहीं आईं,परीक्षा लेना और परिणाम घोषित करना तक सीमित रहा,न  एक बार भी दीक्षांत समारोह हुए और न ही शोध कार्यो को गति मिली।हाल ही में पीएचडी के लिए पंजीयन करने परीक्षा की अधिसूचना को वे अपनी बड़ी उपलब्धि गिना रहे हैं।जबकि उत्तरपुस्तिकाओं की खरीदी के मामले में उनकी किरकिरी हुई है। समर्थक भी दबी जुबान पर प्रशासनिक अस्थिरता और संस्थागत संचालन में उन्हें पूरी तरह विफल मान रहे हैं। इसके बावजूद बिलासपुर विश्वविद्यालय के कुलपति पद के लिए उनकी सक्रियता और प्रयासों ने कई लोगों को आश्चर्यचकित किया है।

शॉर्टलिस्टिंग पर उठे सवाल

विश्वविद्यालय से जुड़े सूत्रों का दावा है कि प्रारंभिक चर्चाओं में कई हाई-प्रोफाइल शिक्षाविदों के नाम प्रमुख थे। हालांकि स्क्रूटनी के बाद सामने आए 20 नामों में कई दिग्गजों का नाम नहीं दिखा।जिसमें पं रविवि के किसी प्रोफेसर का नाम न आना आश्चर्यजनक है। शॉर्टलिस्टिंग का आधार सार्वजनिक नहीं होने से प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर भी प्रश्न उठ रहे हैं।

कुछ सूत्र यह भी दावा कर रहे हैं कि पहले चरण में ही प्रो. पटेरिया ने अपने कई प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ने सफल हो गए हैं। 

पैनल में नाम ही असली लड़ाई

राजनीति की तरह ही कुलपति चयन में भी अंतिम पैनल में नाम आना निर्णायक माना जाता है। पैनल में शामिल होने के बाद उम्मीदवारों को अपने पक्ष में समर्थन जुटाने का अवसर मिलता है। एक दशक पहले चयन समिति की बैठक के तत्काल बाद आदेश जारी कर दिए जाते थे, लेकिन बदली परिस्थितियों में अब समय अंतराल बढ़ने से लॉबिंग की संभावनाओं की चर्चा भी तेज हो जाती है।

नेटवर्किंग की चर्चा

सूत्रों के हवाले से यह भी कहा जा रहा है कि प्रो. पटेरिया ने खुद को मजबूत स्थिति में रखने के लिए बाहरी संपर्कों का सहारा लिया। गुजरात के एक प्रभावशाली व्यक्ति से उनके सतत संपर्क की चर्चाएं हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

स्थानीय बनाम बाहरी का समीकरण

प्रदेश में हालिया कुलपति नियुक्तियों में बाहरी व्यक्तियों की संख्या अधिक रहने पर विरोध के स्वर उभरे थे। ऐसे में यह संभावना जताई जा रही है कि भविष्य की नियुक्तियों में स्थानीय उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी जा सकती है।

शॉर्टलिस्ट किए गए 20 नामों में 10 छत्तीसगढ़ से बताए जा रहे हैं। इनमें

एक सेवानिवृत्त

एक पूर्व में निलंबित

एक जांच के दायरे में

एक अन्य राज्य में भी कुलपति पद के इच्छुक बताए जा रहे हैं।

इन परिस्थितियों में सक्रिय स्थानीय दावेदारों की संख्या सीमित मानी जा रही है, जिससे प्रो. पटेरिया की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत आंकी जा रही है।

इंटरैक्शन तिथि परिवर्तन पर चर्चा

पहले इंटरैक्शन की तिथि 2 मार्च निर्धारित थी, जिसे 1 मार्च की शाम को निरस्त कर 3 मार्च कर दिया गया। इस बदलाव को लेकर भी चर्चाएं हैं कि इससे बाहरी राज्यों के कुछ उम्मीदवारों की उपस्थिति प्रभावित हुई है।जिसमें ऐसे 4 दावेदार अनुपस्थित रहे। इस तरह 20 में मात्र 16 आवेदकों ने अपनी उपस्थिति दर्ज की।हालांकि इस पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

अंतिम निर्णय पर टिकी निगाहें

अब चयन समिति द्वारा तैयार अंतिम पैनल कुलाधिपति को सौंपा जाएगा, जहां से नियुक्ति की अधिसूचना जारी होगी। क्या यह “लोक भवन” की विशेष कृपा का परिणाम होगा, या प्रो. पटेरिया की रणनीतिक सक्रियता और स्थानीय समीकरण का प्रभाव,अंतिम पैनल के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा।