कार्यकाल समाप्त, फिर भी पद पर कायम: कुलपति को लेकर बढ़े सवाल।

नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद आदेश लंबित? पारदर्शिता पर उठे प्रश्न...

कार्यकाल समाप्त, फिर भी पद पर कायम: कुलपति को लेकर बढ़े सवाल।

रायगढ़। शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय में कुलपति पद को लेकर स्थिति चर्चा का विषय बनी हुई है। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. ललित प्रकाश पटेरिया का निर्धारित पांच वर्षीय कार्यकाल 24 नवंबर 2025 को समाप्त हो चुका है। इसके बावजूद वे पद पर कार्यरत हैं, जिससे प्रशासनिक एवं वैधानिक स्थिति को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

बता दें कि विश्वविद्यालय अधिनियम में कुलपति का कार्यकाल पांच वर्ष निर्धारित है। ऐसे में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या उन्हें विधिवत कार्यवाहक कुलपति के रूप में अधिकृत किया गया है? यदि हाँ, तो संबंधित आदेश सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? और यदि नहीं, तो वर्तमान में उनकी वैधानिक स्थिति क्या है?

परिसर में चर्चा और पारदर्शिता की मांग

विश्वविद्यालय से जुड़े प्राध्यापकों एवं छात्र संगठनों के बीच इस विषय को लेकर चर्चा तेज है। कई शिक्षकों का कहना है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रशासनिक निर्णयों की पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक है। छात्र संगठनों ने भी स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।

नियुक्ति प्रक्रिया पर भी उठे सवाल

सूत्रों के अनुसार सर्च कमेटी का गठन किया गया था तथा उम्मीदवारों के साक्षात्कार की प्रक्रिया 9 नवंबर को पूर्ण हो चुकी है। ऐसे में यह प्रश्न उठ रहा है कि अंतिम नियुक्ति आदेश अब तक जारी क्यों नहीं हुआ। क्या फाइल शासन स्तर पर लंबित है? या औपचारिक प्रक्रियाएँ शेष हैं? इस संबंध में कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।

RTI के जरिए जानकारी लेने की तैयारी

विश्वविद्यालय से जुड़े कुछ लोगों द्वारा सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत आवेदन दायर करने की तैयारी की जा रही है। संभावित रूप से निम्न बिंदुओं पर जानकारी मांगी जाएगी—

क्या कुलपति को कार्यकाल विस्तार अथवा कार्यवाहक रूप में कार्य करने का आदेश जारी किया गया है?

यदि हाँ, तो आदेश की प्रमाणित प्रति

नई नियुक्ति प्रक्रिया की वर्तमान स्थिति

सर्च कमेटी की अनुशंसा और आगे की कार्यवाही

विधि विशेषज्ञों की राय

कानूनी विशेषज्ञों का मत है कि यदि अधिनियम में यह प्रावधान है कि नए कुलपति की नियुक्ति तक वर्तमान कुलपति कार्यवाहक रूप में बने रह सकते हैं, तो यह वैधानिक माना जाएगा—बशर्ते सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्पष्ट आदेश जारी किया गया हो। आदेश के अभाव में स्थिति विवाद का कारण बन सकती है।

उच्च शिक्षा संस्थानों की गरिमा, विश्वसनीयता और प्रशासनिक पारदर्शिता बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि संबंधित प्राधिकरण इस विषय पर शीघ्र स्पष्टता प्रदान करें। फिलहाल विश्वविद्यालय समुदाय की निगाहें शासन एवं कुलाधिपति कार्यालय की ओर टिकी हुई हैं।