शहीद नंदकुमार पटेल विवि में कार्यकाल पश्चात वित्तीय फैसलों पर सवाल। कुलपति पटेरिया ने आगामी 5 साल के लिए खरीदी करोड़ों की उत्तरपुस्तिका...

शहीद नंदकुमार पटेल विवि में कार्यकाल पश्चात वित्तीय फैसलों पर सवाल। कुलपति पटेरिया ने आगामी 5 साल के लिए खरीदी करोड़ों की उत्तरपुस्तिका...

रायगढ़। वित्त मंत्री ओ. पी. चौधरी के गृह क्षेत्र रायगढ़ स्थित शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय इन दिनों वित्तीय निर्णयों को लेकर सुर्खियों में है। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. पटेरिया का नियमित पाँच वर्षीय कार्यकाल समाप्त हो चुका है, किंतु आरोप है कि वे कार्यवाहक स्थिति में रहते हुए भी बड़े पैमाने पर वित्तीय निर्णय ले रहे हैं।

पाँच वर्ष शांत, तीन माह में सक्रियता क्यों?

सूत्रों के अनुसार, अपने पूरे नियमित कार्यकाल में जिन वित्तीय प्रस्तावों को अमल में नहीं लाया गया, उन्हें पिछले तीन माह में तेजी से स्वीकृत किया गया। विशेष रूप से करोड़ों रुपये की उत्तर पुस्तिकाओं की खरीदी आगामी पाँच वर्षों के लिए किए जाने का मामला चर्चा में है। इस प्रस्ताव को हाल ही में बुलाई गई कार्यपरिषद की आपात बैठक में अनुमोदित भी करा लिया गया।

बताया जाता है कि बैठक में मात्र दो सदस्य ही भौतिक रूप से उपस्थित थे, जिससे पारदर्शिता और प्रक्रिया की वैधता पर भी प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।

कार्यवाहक कुलपति के अधिकारों पर बहस

प्रदेश में कुलपति का नियमित कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है। कार्यकाल पूर्ण होने के बाद यदि नई नियुक्ति न हो तो संबंधित कुलपति कार्यवाहक रूप में सीमित प्रशासनिक दायित्व निभाते हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या कार्यवाहक कुलपति को दीर्घकालिक वित्तीय प्रतिबद्धताएँ लेने का अधिकार है?

आलोचकों का कहना है कि पिछले पाँच वर्षों में “सरकार का सहयोग नहीं” मिलने की दलील देने वाले कुलपति द्वारा अचानक व्यापक वित्तीय सक्रियता कई शंकाओं को जन्म देती है। स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि क्या इन निर्णयों के पीछे उच्च स्तर की मौन सहमति है?

जैम पोर्टल और समान फर्मों को कार्यादेश

मामले को और संवेदनशील इसलिए भी माना जा रहा है क्योंकि हाल ही में अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय, बिलासपुर में वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों पर तत्कालीन कुलसचिव शैलेन्द्र दुबे को निलंबित किया गया। शासन के आदेश में जैम (GeM) पोर्टल के माध्यम से सामग्री क्रय में अनियमितता तथा छत्तीसगढ़ भंडार क्रय नियम 2002 (संशोधित 2025) के उल्लंघन का उल्लेख किया गया है।

रायगढ़ विश्वविद्यालय में भी कथित रूप से जैम पोर्टल के माध्यम से सामग्री क्रय की गई है और उन्हीं फर्मों को कार्यादेश दिए जाने की चर्चा है, जिन्हें बिलासपुर विश्वविद्यालय ने भी आदेश दिए थे। अंतर यह बताया जा रहा है कि बिलासपुर विश्वविद्यालय में अधोसंरचना और शैक्षणिक इकाइयाँ विकसित हैं, जबकि रायगढ़ विश्वविद्यालय मुख्यतः परीक्षा संचालन और परिणाम प्रकाशन तक सीमित रहा है। ऐसे में बड़े पैमाने की खरीदी की आवश्यकता पर सवाल उठ रहे हैं।

उच्च शिक्षा विभाग की भूमिका पर प्रश्न

प्रदेश में उच्च शिक्षा विभाग आर्थिक अनियमितताओं के मामलों में सक्रियता दिखा रहा है। बावजूद इसके, रायगढ़ विश्वविद्यालय में लिए गए हालिया निर्णयों की अब तक कोई औपचारिक जांच प्रारंभ न होने से भी चर्चा तेज है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कार्यवाहक स्थिति में दीर्घकालिक वित्तीय दायित्व लिए गए हैं, तो उनकी वैधता की जांच आवश्यक है। आवश्यकता पड़ने पर आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) में शिकायत दर्ज हो सकती है।

जवाबदेही तय होगी?

सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या कार्यकाल समाप्ति के बाद लिए गए वित्तीय निर्णय नियमसम्मत हैं? यदि हाँ, तो उनकी पारदर्शिता सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही? और यदि नहीं, तो अब तक जांच क्यों नहीं? रायगढ़ सहित पूरे प्रदेश की निगाहें अब उच्च शिक्षा विभाग और शासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।