धारा-52 के ‘अंतरिम’ कुलपति या पूर्ण अधिकार? कार्यकाल पश्चात भी प्रो. पटेरिया के फैसलों पर उठते सवाल..?

धारा-52 के ‘अंतरिम’ कुलपति या पूर्ण अधिकार? कार्यकाल पश्चात भी प्रो. पटेरिया के फैसलों पर उठते सवाल..?

रायगढ़। शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय एक बार फिर प्रशासनिक और वित्तीय निर्णयों को लेकर चर्चा के केंद्र में है। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. ललित प्रकाश पटेरिया का नियमित कार्यकाल समाप्त हुए तीन माह से अधिक समय बीत चुका है, बावजूद इसके वे अब भी पद पर बने हुए हैं।

प्रो. पटेरिया की नियुक्ति कांग्रेस शासनकाल में हुई थी और उस समय के उच्च शिक्षा नेतृत्व सहित कई कांग्रेस विधायकों के करीबी माने जाते रहे हैं। विश्वविद्यालय से जुड़े सूत्रों का दावा है कि कार्यपरिषद के लगभग 90 प्रतिशत सदस्य भी उसी कालखंड में मनोनीत हुए थे। यही कारण बताया जा रहा है कि कार्यपरिषद की बैठकों में उनके प्रस्तावों को सहजता से अनुमोदन मिल जाता है—चाहे बैठक में सदस्यों की पूर्ण उपस्थिति हो या नहीं।

हाल ही में करोड़ों रुपये की उत्तरपुस्तिकाओं की खरीदी का निर्णय विशेष विवाद का कारण बना है। प्रश्न उठ रहे हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में इतनी बड़ी मात्रा में खरीदी की तात्कालिक आवश्यकता क्या थी? इसके साथ ही अपनाई गई प्रक्रिया, आपात बैठक बुलाने का समय और बैठक में न्यून उपस्थिति जैसे पहलुओं पर भी गंभीर चर्चा हो रही है। उल्लेखनीय है कि जिस समय यह बैठक आयोजित की गई, उसी दौरान विधानसभा का बजट सत्र चल रहा था। आलोचकों का आरोप है कि यह समय इसलिए चुना गया ताकि सत्ता पक्ष के मनोनीत सदस्य उपस्थित न हो सकें और बिना व्यापक बहस के प्रस्ताव पारित हो जाए।

शिक्षा जगत में यह विमर्श भी तेज है कि कार्यकाल समाप्ति के बाद किसी कुलपति द्वारा बड़े वित्तीय या नीतिगत निर्णय लेना कितना उचित है। छत्तीसगढ़ के अन्य विश्वविद्यालयों में परंपरा रही है कि नए कुलपति की चयन प्रक्रिया प्रारंभ होते ही निवर्तमान कुलपति महत्वपूर्ण वित्तीय निर्णयों से स्वयं को दूर रखते हैं, ताकि प्रशासनिक शुचिता और पारदर्शिता बनी रहे।

वर्तमान स्थिति में प्रो. पटेरिया के पास शासन स्तर से कोई नवीन लिखित आदेश उपलब्ध नहीं बताया जा रहा है। वे विश्वविद्यालय अधिनियम की प्रावधान के तहत अंतरिम व्यवस्था में कार्य कर रहे हैं। किंतु मुख्य प्रश्न यही है—क्या यह प्रावधान उन्हें व्यापक वित्तीय निर्णय लेने का नैतिक एवं प्रशासनिक अधिकार देता है, या फिर उन्हें केवल नियमित प्रशासनिक निरंतरता तक सीमित रहना चाहिए?

अब निगाहें लोकभवन, राज्य शासन और उच्च शिक्षा विभाग की संभावित प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। क्या इस मामले की प्रशासनिक या वित्तीय समीक्षा होगी? क्या कार्यपरिषद की कार्यवाही और खरीदी प्रक्रिया सार्वजनिक की जाएगी? इन सवालों के जवाब ही स्पष्ट करेंगे कि मामला केवल प्रक्रिया का पालन है या विश्वविद्यालय प्रशासन की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह।